Tuesday, 28 January 2014

यह कैसी गरीबी!

आज(28 जनवरी 2014) सूबह-सूबह, करीब 8 बजे, मैं अपने कॉलोनी से बाहर टहलने के लिए निकला। जब मुख्‍य रोड़ (एबी रोड) पहुंचा तो देखा की कॉलोनी से जुड़े इस रोड़ के पास स्थित नगर निगम जोन ऑफिस के बाहर तीन-चार महंगी गाडि़यां (दो पहीए और चार पहीए) सहित कई गाडि़यां खड़ी थी और बहुत सारे लोग जोन के अंदर और बाहर बहुत सारे लोग खड़े थे। मैं समझा सूबह-सूबह कोई नेता आया है। अचानक मुझे याद आया, आज तो मंगलवार है और इंदौर में हर मंगलवार को गरीबों के लिए बीपीएल का कार्ड बनता है। इसलिए लोग अपना कार्ड बनवाने के लिए लाईन में खड़े हैं जिसमें महिलाएं, बूजुर्ग और बच्‍चें भी शामिल हैं।

पिछले मंगलवार को इंदौर नगर निगम के नेहरु नगर और सुखलिया स्थित जोन पर बीपीएल कार्ड बनवाने के लिए खड़े महिलाओं एवं पुरुषों पर पुलिस ने लाठीचार्च किया था जिसके कारण आज कार्ड नहीं बन रहा है। फिर भी लोगों की लंबी लाइनें लगी हुई थी।  

लाइन में लगे सभी व वहां पर उपस्थित सभी लोग अपना बीपीएल कार्ड बनवाना चाहते थे। जोन में आज कार्ड नहीं बनने के कारण्‍ वे सभी लोग उदास इस प्रतिक्षा में खड़े थे की शायद देर से ही सही कार्ड बनना शुरू हो जाए। मैं उन सभी लोगों को ध्‍यान से देखने लगा। वहां पर उपस्थित लगभग 400 लोगों में से लगभग 300 लोगों ने महंगे कपड़े पहन रखे थे। पुरुषों के शरीर पर लगभग 1000 रुपए की कोर्ट तथा महिलाओं ने लगभग 500 रुपए वाली साडि़यां पहन रखी थी। (आज कोई भी कोर्ट 1000 रुपए तथा साड़ी 500 रुपए से नीचे पर नहीं मिलती है।) साथ- ही-साथ जोन के बाहर कई मोटरसाईकल लगी हुई थी। (आज एक मोटरबाईक की कीमत कम से कम 40000 रुपए है।)

जोन के पास और अंदर खड़े लोगों से मैने बात की तो वो कहने लगे, हम तो भईया, बहुत गरीब है, रहने को आवास नही, खाने के लिए दो वक्‍त की रोटी नही, कमाई का कोई साधन नही, तथा पहनने के लिए कपड़ा तक नहीं है। हम ठंड में भगवान के भरोसे रहते हैं। इसी तरह की बाते सभी लोग कर रहे थे। उनका कहना था कि हम अब इस बीपीएल कार्ड के भरोसे हैं जिससे हमें दो वक्‍त का भोजन तो प्राप्‍त होगा। फिर मैं उनलोगों को आज कार्ड नहीं बनने की सूचना देकर उन्‍हें घर जाने को कह मैं भी वहीं पास के ठेले पर चाय पीने लगा।

चाय पीते-पीते मैं सोंच रहा था कि आखिर यह कौन सी ऐसी चीज है जिसे पाने के लिए लोग गरीबी का चोला पहन लेते हैं? उन्‍हें थोडी सी भी शर्म नहीं आती है गरीबों का हक मारने में। ठेले के पास बैठे कुछ लोग कह रहे थे की जिसकी थोडी प्रशासन और नेताओं के पास पहुंच है, उसका तो कार्ड बन ही जाएगा। क्‍या इससे गरीबों का हक प्राप्‍त हो पाएगा? क्‍या वो किसी भी सरकारी मुफ्त योजनाओं का लाभ उठा पांएगे?

इन्‍ही सब प्रश्‍नों का उत्‍तर ढूंढ रहा था, तभी मेरी चाय खत्‍म हो गई और मैं यह सोंच कर वहां से जाने लगा कि यह तो मानसिक गरीबी है, इसे कोई नहीं बदल सकता। हर धनवान को गरीबों का हक मारने में मजा आता है और उन्‍हें मुफ्त में मिल रही सुविधाओं को छिन कर उन्‍हें रास्‍ते पर और भीख मांगकर अपना गुजारा करने पर मजबुर कर देते हैं।

अब आप ही बताएं क्‍या कभी इस तरह की गरीबी भारत से खत्‍म होगी? और हां आप लोग भी उन लोगों से यह सवाल जरुर पूछें जिसके पास सब तरह की सुविधाएं रहने के बाद भी हर समय कहते रहते हैं कि हम सबसे गरीब है, कि वो गरीबों का मजाक क्‍यों उडा रहे हैं? अगर आप चैन ने नहीं बैठ सकते तो कृपया कर उन्‍हें तो कम-से-कम चैन से भीख मांगकर ही चैन से खाना खाने और फूटपाथ पर सोने तो दें।

Tuesday, 14 January 2014

कानून केवल महिलाओं के लिए क्यों ??



तीन दिन पूर्व मैं रायपूर गया था। स्‍टेशन से कुशाभाउ ठाकरे विश्‍वविद्यालय जाने के लिए सिटी बस और ऑटों का इंतजार करने लगा। तभी एक व्‍यक्ति ने बताया कि कुशाभाउ ठाकरे विश्‍विद्यालय के लिए सीधे कोई ऑटो या सिटी बस नहीं जाती है। आपको पहले घड़ी चौक, पंचमडी, भाटा गांव चौक और फिर वहां से आपको ऑटो बुक करके विश्‍वविद्यालय जाना होगा।

मैं अपने दोस्‍त के साथ स्‍टेशन से सिटी बस में सवार होकर घडी़ चौक जाने लगा। बस में एक 18 साल की लड़की चढ़ी और आगे की गेट के पास खड़ी हो गई। जब बस चलने लगी तो बस के ड्राइवर और कंडक्‍टर ने उसे खाली सीट पर बैठने को कहा, तो अपनी कुछ परेशानी बताकर सीट पर बैठने से मना कर दिया। कंडक्‍टर ने उसे गेट से थोडा पीछे हटकर खड़ा होने का निवेदन किया जिसे लड़की ने नकार दिया।

जब बस के ड्राइवर और कंडक्‍टर ने उसे कड़े शब्‍दों में डांटकर उसे बस से नीचे उतरने, सीट पर बैठने तथा गेट से पीछे खड़े होने का कहा तो वह लड़की बदतमीजी पर उतर आई। बस के सभी सवारियों ने लड़की को बहुत समझाने का प्रयास किया, मगर वह नहीं मानी। तबतक हमारा स्‍टॉप आ गया था। हम वहां से एक ऑटो पर बैठ पंचमडी जाने लगे।
मेरे साथ बैठे दोस्‍त ने मुझसे कहा कि बस का कंडक्‍टर लड़की से कितनी बदतमीजी से बात कर रहा था, मेरा मन कर रहा था कि उस बस कंडक्‍टर को जोरदार थप्‍पड मारू। मैने भी दोस्‍त को जवाब दिया कि लड़की कितनी बदतमीजी से बात कर रही थी उसको, तुमने नहीं सुना, तो उसने मेरी बात को काटते हुए कहा कि कुछ भी हो कंडक्‍टर और ड्राइवर को 
लड़की से इस तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए।

मैं दोस्‍त की बात सुन चौक गया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसका मैं क्‍या जवाब दूं। लेकिन मेरे दिमाग मे यह प्रश्‍न खड़ा हो गया कि क्‍या पुरुषों को ही शिष्‍टाचार निभानी चाहिए, लड़कियों को नहीं? क्‍या लड़कियां ही बदतमीजी से बात कर सकती है और पुरुष नही? क्‍या सभी देश में लगातार बढ़ रहे यौन उत्‍पीडन के मामले में पुरुष ही दोषी हैं, महिलाएं नहीं?   

इसी प्रश्‍न का उत्‍तर ढूढ़ रहा था तभी मध्‍यप्रदेश के इंदौर में वर्ष 2013 में फरवरी से लेकर दिंसबर तक होने वाले यौन उत्‍पीडन के कुछ मामले मुझे याद आने लगे जिसमें, 10 पुलिस रिपोर्ट ऐसे थे, जिसमें महिला ने अपनी दबंगई दिखाने के लिए पुरुष पर यौन उत्‍पीडन के आरोप लगाए थे। एक मामला ऐसा था कि जब किराए से रह रही महिला से जब मकान मालिक ने किराया मांगा तो, उसने मालिक के ऊपर यौन उत्‍पीडन जैसे गंभीर आरोप लगा दिए।

हमारा कानून भी इस तरह के आरोपों में सच्‍चाई जानने का प्रयास नहीं करने देता है जिससे, एक बेगुनाह व्‍यक्ति सलाखों के पीछे चला जाता है। इंदौर के मामले में जेल से छुटने के बाद मकान मालिक ने खुदकुशी कर ली, जब जांच हुई तो उसके खिलाफ लगे आरोप गलत निकले। इस तरह के कई आरोप रोज भारत में पुरुषों पर लगाए जाते हैं जिनमें से 50 फीसदी आरोप गलत होते हैं।

मैं किसी पुरुष को इस तरह के आरोपों से बचाने का प्रयास नहीं कर रहा हूं और ना ही किसी महिला पर हुए अत्‍याचार को गलत बता रहा हूं। मगर यह प्रश्‍न अवश्‍य कर रहा हूं कि उसके द्वारा लगाए गए इस तरह के गंभर आरोप में कितनी सच्‍चाई है? अगर कोई महिला किसी पुरुष का यौन उत्‍पीडन करती है तो उसके ऊपर भारतीय संविधान के किस धारा के तहत दंड दिया जा सकता है? यह प्रश्‍न बहुत ही गलत हो सकता है, मगर रायपुर में मेरे दोस्‍त द्वारा बदतमीजी कर रही लड़की का पक्ष लेने से मुझे काफी दुख हुआ और इंदौर के घटना ने मुझे समाज से और भारतीय कानून से यह प्रश्‍न करने को मजबुर कर दिया।

महिलाओं के लिए भारत में कई तरह के कानून हैं जिसका प्रयोग कर वह पुरुष को सलाखों के पीछे डाल सकती है, मगर भारत में पुरुषों की रक्षा के कौन सा कानून है?

आप सभी को एतराज फिल्‍म याद ही होगा जिसमें प्रियंका चोपडा अपने पद का प्रयोग कर अक्षय कुमार पर किस तरह के यौन उत्‍पीडन के आरोप लगाए थे जिसमें पूरी गलती प्रियंका की थी, जो बाद में पेश हुए साक्ष्यों और गवाहों में साबित हुआ। हमारी भारतीय न्‍यायालय से अनुरोध है कि इस तरह के मामले में अंतिम फैसला देते समय मामले से संबंधित सभी साक्ष्‍य देख की ही फैसला दें नहीं तो हमेशा ही एक बेगुनाह नागरिक अपराधी साबित होगा और अपराधी खुल्‍लेआम सड़को पर घूमता नजर आएगा।

Monday, 13 January 2014

यह कैसा समाज !!

भारत में पिछले 2 सालों में यौन उत्‍पीडन जैसे मामले की बाढ़ आ गई है। इसमें से कुछ राजनीतिक मामले बने तो कुछ, बड़ पदों पर बैठे लोगों के लिए मुसीबत। कहने का तात्‍पर्य यह है कि भारत में जहां एक तरफ महिलाओं को देवी समझा जाता है उसी समाज को 2012 के दिसंबर में दिल्‍ली में हुए सामुहिक दुश्‍कर्म मामले ने पूरे देश के हिला कर रख दिया। इससे पहले बहुत सारे यौन उत्‍पीडन के मामले बने मगर, हर समय साक्ष्‍य के अभाव में अपराधी मुक्‍त हो जाते थे।

2012 के घटना के बाद भारत में महिलाओं को यौन उत्‍पीडन से बचाने के लिए यौन उत्‍पीडन हिंसा कानून 2012 बना जिसमें, अगर कोई व्‍यक्ति किसी भी महिला से आप्‍पतीजनक बाते करता है, उससे ज्‍यादा देर तक घुरता है, अश्‍लील इशारे करता है, उसे छेड़ता है या फिर उसे घमकाकर उसके साथ दुराचार करता है, तो वह इस कानून के तहत दोषी करार दिया जाएगा।

भारत में जैसे ही यह कानून पास हुआ, देश के अलग-अलग हिस्‍सों से इस तरह की घटनाओं की बाढ़ आ गई। कुछ महिलाओं ने पुरुषों को नीचा दिखाने के लिए इस कानून का प्रयोग किया तो कुछ पहले यौन हिंसा की शिकार महिलाओं ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाना शुरु किया। इसे देख कर तो ऐसा लगता है कि अब महिलाओं में जागरुकता फैल गई है और वो खुलेआम पुरुषों का मुकाबला कर रही हैं।

वहीं दूसरी तरफ समाज के अन्‍य लोगों के इसारे पर महिलाएं लगातार इस तरह के कानून की धज्जियां उडा रही है। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्‍यायधीस  ए सज्‍जन के खिलाफ भी एक लॉ इटर्न ने यौन उत्‍पीडन का मामला दर्ज कराया है। इससे पहले जस्टिस गांगुली और तहलका के संस्‍थापक संपादक तरुण तेजपाल के खिलाफ इसी तरह का मामला चल रहा है।
इन सब के बावजुद भी यौन उत्‍पीडन के मामले में कमी नहीं देख जा रही है और रेप की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही है। रोज समाचार-पत्रों एवं चैनलों पर कई शहरों से लगभग  खबरें आ ही जाती है। अभी इंदौर के ही खालसा कॉलेज की सहायक प्रोफेसर ने भूमाफिया बॉबी पर इसी तरह का आरोप लगाया है।

इस तरह की रोजाना आ रही खबरों से अब हमारे समाज पर प्रश्‍नचिन्‍ह उठ खडा हुआ है। क्‍या महिलाएं केवल यौन उत्‍पीडन के लिए बनी है? क्‍या समाज में रहने वाला उस व्‍यक्ति के घर में अपनी कोई मां-बहन या फिर पत्‍नी नहीं है क्‍या, जिसने यह अपराध किया है? आज जो बड़े पदों पर बैठे हैं उनके लिए गरीबों या मध्‍यम वर्ग के महिलाओं के पास अपना कोई सम्‍मान नहीं है क्‍या? अगर कोई उनके घर के महिला सदस्‍यों के साथ ऐसा करे तो उन्‍हें कैसा लगेगा? वो फिर अपनी पहुंच का इस्‍तेमाल कर आरोपियों को सजा दिलवा देते हैं। और हॉ, हमारा कानून भी उनकी ही सहायता करता है ना कि गरीबों का। इसे हम कौन सा समाज कहेंगे?


आप सोंचिए और बताईए कि हम किस समाज में रह रहे हैं और समाज को असभ्‍य रास्‍ते पर ले जाने वालों के साथ किस तरह का व्‍यवहार करना चाहिए?

राजनीति का शिकार कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय

मैं पिछले दिनों कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्‍वविद्यालय, रायपुर में पीएचडी के साक्षात्‍कार हेतू गया हुआ था। पहले तो रायुपर स्‍टेशन से विश्‍वविद्यालय जाने में बड़ी परेशानी हुई मगर, जब वहां पहुंचा तो विश्‍वविद्यालय की इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर देख दंग रह गया। तीन दिनों के अपने यात्रा के दौरान मैंने विश्‍वविद्यालय के सभी विभागों, पुस्‍तकालय, स्‍टूडियो, कैंपस, हॉस्टल तथा आस-पास के क्षेत्रों के देखा।

इस दौरान मैने देखा की विश्‍वविद्यालय के पास एक अच्‍छी पुस्‍तकालय के अलावा इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर और बड़ी कैंपस के अलावा कुछ भी अच्‍छा नहीं है। यह विश्‍वविद्यालय राज्‍य के मुख्‍यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सबसे अहम प्रोजेक्‍ट में से एक है, उसके बावजुद यह विश्‍वविद्यालय लगातार घाटे में चल रहा है।

भारत में अभी तक केवल तीन ही पूर्ण रूपेण पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्‍वविद्यालय हैं और तीनों ही राज्‍य विश्‍वविद्यालय हैं। ये तीनों ही विश्‍वविद्यालयों में से माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्‍वविद्यालय सबसे पुरानी है और सफलतापूर्वक चल भी रही है।

कुशाभाउ ठाकरे विश्‍वविद्यालय का गठन 2005 में हुआ। मध्‍यप्रदेश से अलग राज्‍य बनने के बाद उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री ने माखनलाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय की तर्ज पर राज्‍य में कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्‍वविद्यालस का गठन कराया। इस विश्‍वविद्यालय के गठन हुए पूरे 5 सालों से भी अधिक का समय गुजर गया है मगर, विश्‍वविद्यालय के पास ज्‍यादा जमीन और आकर्षक बिल्डिंग के अलावा कुछ भी नहीं है।

इस दौरान मैने विश्‍वविद्यालय में ही चाय बेचने वाले से मेरी बातचीत हुई तो उसने कई राज खोलें। उसका कहना था कि विश्‍वविद्यालय में हद से ज्‍यादा राजनीति चल रही है। कोई किसी को भी आगे बढ़ने नहीं देता है और लगातार उसका टांग खिचे रहता है। उसका कहना था कि यहां हॉस्‍टल में रह रहे विद्यार्थियों के लिए भोजन की व्‍यवसथा की सही नहीं है।

अपना नाम न बताने की शर्त पर उसने बताया कि यहां के फैकेल्‍टी सदस्‍य उनहें चाय उधार न देने पर दुकान खाली करने की धमकियां देते रहते हैं। एक तो विश्‍वविद्यालय शहर से काफी दूर है और ना ही कोई आवागमन के साधन। इस कारण यहां विद्यार्थी भी कम ही आते हैं।

वहीं विश्‍वविद्यालय के एक विभाग के सहायक प्रोफेसर से बातचीत हुई तो उन्‍होंने भी इस तरह की कमियों को स्‍वीकारा और यह भी कहा की इसे दूर करने के लिए हम लगातार सोशल वर्क कर रहे हैं। इस साल हमने दो गावों को गोद लेकर उसका विकास कर रहे हैं और आने वाले दिनों में एक समुदायिक रेडियो स्‍थापित करने की योजना है।

इसके बाद मैने विश्‍वविद्यालय के अन्‍य सदस्‍यों, चपरासी तथा विद्यार्थियों से बात की। सबसे एक सुर में कहा कि जबतक विश्‍वविद्यालय से राजनीति खत्‍म नहीं होगी, यहां की व्‍यवसथा कभी नहीं सुधरेगी और ना ही ज्‍यादा बच्‍चे यहां आ पाएंगे।

हालांकि विश्‍वविद्यालय की पुस्‍तकालय सबसे अच्‍छी है। साथ ही कैंपस भी सबसे बड़ा है और लगातार यहां पर कार्य हो रहा है। अगर इसी तरह कैंपस को सुधारने का कार्य चलता रहे तो यह विश्‍वविद्यालस देश के सभी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय को कैंपस के मामले में पीछे छोड देगी।


Friday, 3 January 2014

विवाह का एक दूसरा रुप ‘पकडुआ विवाह’

भारत में दीपावली पर्व के बाद और गोवर्धन पूजा खत्म होते ही हिन्दू समाज में शादी-विवाह की धूम शुरू हो जाती है। इस दौरान अपने बच्चों के लिए सही वर तलाशने के लिए लड़की और लड़के पक्ष की भाग-दौड़ शुरू हो जाती है। सबसे ज्यादा भाग-दौड़ बिहार और उत्तरप्रदेश में देखी जाती है। यहां पर दहेज प्रथा भी खूब चलती है। इसी दौरान एक और शादी का माहौल शुरू हो जाता है जिसे पकडुआ विवाह यानी जबरन शादी कहते हैं।

जब मैं पटना में रहता था तो मेरे कमरे के बगल में ही मैथली क्षेत्र से 10 लड़के रहते थे, जो घर से इसी कारण भागकर पटना में रह रहे थे। जब मेरी उनसे बात हुई तो उन्होंने बताया कि हमें पकड़ने के लिए कई लोग पटना आ चुके हैं, मगर हमारे बारे में जब उन्हें सूचना नहीं मिली तो वे वापस लौट गए। अभी मेरी पटना यात्रा के दौरान फिर उन्हीं दोस्तों से मुलाकात हुई तो फिर इस विवाह के बारे में बातें शुरू हो गईं।

यह शादी बिहार के मैथली भाषी इलाकों में सबसे ज्यादा देखने को मिलती है जिसमें बिहार के मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, समस्तीपुर, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, बरौनी जिलों के अलावा पश्चिमी चम्पारण जिलों में खूब देखने को मिलती है। इसी कारण यहां के युवा जब 20 वर्ष के होते हैं तो अपने शहर से दूर भाग जाते हैं जिसके बारे में केवल उनके परिवार को मालूम होता है, अन्य किसी भी रिश्तेदार को नहीं और न ही किसी गांव वाले को। ये युवा समय-समय पर अपने घर भी जाते हैं, मगर सबसे छुपकर।

बिहार में इस शादी का इतिहास बहुत पुराना है। वहां के स्थानीय निवासी और माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रो. डॉ. अरुण कुमार भगत के अनुसार यह परंपरा लगभग 50 सालों से चली आ रही है और कोई इसका विरोध नहीं करता है। स्थानीय निवासी इस तरह की शादियों का विरोध इसलिए नहीं करते हैं कि इसमें न दहेज का टेंशन है और न ही ज्यादा खर्च का।

इस पकडुआ विवाह का शि‍कार बिहार के नावादा का रहने वाला संतोष कुमार आमिर खान के शो 'सत्यमेव जयते' तथा अमिताभ बच्चन के शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में भी आ चुका है। संतोष कुमार ने आमिर खान को बताया था कि उसकी शादी उसकी मर्जी के खि‍लाफ जबरन कर दी गई थी, मगर आज हम दोनों बहुत खुश है और हमें अपनी पत्नी पर गर्व है।

आइए अब आपको बताते हैं कि कैसे होता है पकडुआ विवाह

डॉ. अरुण कुमार भगत के अनुसार यह शादी इस क्षेत्र की परंपरा में शामिल हो गई है। इसमें केवल लड़कों को ही उठा (अपहरण) कर जबरन शादी की जाती है। इस काम को स्थानीय दबंग पूरा करते हैं जिसके बदले में वे लड़की पक्ष से पैसे भी लेते हैं। कभी-कभी यह काम परिवार के सदस्य ही पूरा कर लेते हैं।

उन्होंने बताया कि जब किसी परिवार में लड़कियां शादी की उम्र की हो जाती हैं तो परिवार वाले लड़की के लिए सही वर की तलाश शुरू कर देते हैं। इसके लिए वे शहर में अपनी ही बिरादरी में पढ़े-लिखे युवकों का तलाश करते हैं।

लड़का पसंद आने पर उसके घर वालों से बात करते हैं। जब बात नहीं बनती है तो फिर स्थानीय दबंग से इसके बारे में बातचीत करते हैं। इस दौरान लड़की उस दबंग को राखी भी बांधती है और लड़की वाले इस काम को करने के लिए पैसे देते हैं। अरुण कुमार भगत ने बताया कि स्थानीय दबंग लड़के के फोटो के आधार पर उसका अपहरण कर लेते हैं और उसे लड़की के घर लेकर आते हैं।

उन्होंने बताया कि लड़के का अपहरण करने से पूर्व लड़की के घर चुपचाप शादी की तैयारियां पूरी कर ली जाती हैं जिसमें केवल परिवार के रिश्तेदार और स्थानीय प्रमुख लोग शामिल होते हैं। शादी का समय भी तय कर दिया जाता है और फिर 5 दिन पूर्व लड़के का अपहरण करने के लिए दबंग से कहा जाता है। कभी-कभी लड़का पकड़ में नहीं आता है, उस स्थिति में जब भी लड़का पकड़ा जाता है या कोई अन्य वैसा ही लड़का मिल जाता है तो फिर से नई तारीख देख शादी करते हैं।

स्थानीय दबंग, परिवार के एक-दो सदस्य के साथ मिलकर तय समय पर लड़के का अपहरण कर लड़की वालों के घर लाता है। इस दौरान लड़के का पूरा सर ढंका होता है। पहले उसे एक बंद कमरे में रखा जाता है फिर उसकी मान-मनौव्वल चलती है। जब लड़का नहीं मानता है तो उसे बंदूक से धमकाकर शादी के लिए राजी किया जाता है फिर परिवार के रीति-रिवाज के अनुसार उसकी शादी हो जाती है।

जब लड़के के घर वालों को शादी की जानकारी होती है तो वो लड़की वालों के घर पहुंच जाते हैं। पहले तो मान-मनौव्वल होती है फिर जबरन दबाव डाला जाता है कि वो लड़की को अपनी बहू बनाएं नहीं तो लड़के तथा परिवार के किसी भी सदस्य की हत्या कर दी जाएगी।

उस दौरान तो लड़के पक्ष वाले मान जाते हैं, मगर बाद में जाकर पुलिस स्टेशन में जबरन शादी का मामला दर्ज कर देते हैं। स्थानीय पुलिस जब जांच के लिए आती है तो लड़की पक्ष वालों और स्थानीय लोगों द्वारा माफी मांग लेने व कुछ पैसे देकर इस मामले को दबा दिया जाता है।

मेरे दोस्तों ने नाम व जगह नहीं बताने की शर्त पर बताया कि जबरन शादी तो हो जाती है, मगर कई दिनों तक लड़की और लड़के में बात नहीं होती है और लड़का लड़की और उसके परिवार पर कई तरह के आरोप लगाता है, मगर लड़की कुछ नहीं बोलती है। अंतत: कुछ दिनों के बाद दोनों में बातचीत शुरू हो जाती है।

मेरे दोस्त बताते हैं कि कई मामले तो ऐसे हुए हैं कि शादी से पहले जो लड़का रो रहा था और शादी से मना कर रहा था, लड़की देखने और शादी के बाद बहुत ही खुश दिखाई देता है और परिवार वाले भी सुंदर और सुशील-सी बहू पाकर बहुत खुश होते हैं।

जबरन शादी के बाद युवक की दास्तां...

उन्हीं दोस्तों में से एक बताता है कि मेरी शादी 2006 में इसी तरह हुई थी। जब मैंने लड़की देखा तो अवाक् रह गया और मन ही मन खुश होने लगा और नाराज होने का नाटक करने लगा। शादी के बाद मेरे परिवार वालों की खुशी का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने लड़की वालों को इतनी सुंदर बहू देने के लिए बधाई भी दी और घर पर एक सार्वजनिक भोज की व्यवस्था की जिसमें पूरे गांव तथा अपने रिश्तेदारों को बुलाया गया और सबके सामने फिर से हमारी शादी हुई।

उसने बताया कि जब इसके बारे में मेरी पत्नी को मालूम हुआ तो उसने मुझसे बहुत नाराज होने का नाटक किया और सारी घटना की जानकारी अपने परिवार वालों को दे दी। बहुत मान- मनौव्वल और मेरे हाथों का बनाया हुआ खाना खाने के बाद मानी। आज हम दोनों बहुत खुश हैं। दिल्ली में रह रहे समस्तीपुर के एक दोस्त ने बताया कि सभी मामले एक तरह के नहीं होते हैं।

उसने बताया कि कभी-कभी लड़की वालों और दबंग की गलती का खामियाजा लड़की को पूरी जिंदगी भुगतना पड़ता है जिसमें वे गलत लड़के का अपहरण कर लेते हैं। कभी-कभी तो जबरन शादी के बाद ऐसी नौबत आ जाती है कि लड़का इसे अपना अपमान समझ आत्महत्या कर लेता है जिसके बाद लड़की पक्ष पर लड़के की हत्या का मामला दर्ज हो जाता है। 

डॉ. अरुण कुमार भगत बताते हैं कि अब समाज में युवाओं की जागरूकता और परिवार की नई सोच से इस तरह की शादियों में थोड़ी कमी हो गई है, हालांकि अभी भी बिहार के कई क्षेत्रों में इस तरह की शादियां हो रही हैं। इस तरह की शादियों में कमी का मुख्य कारण युवाओं की नई सोच, टेक्नोलॉजी और लव मैरेज के प्रति आकर्षण है। इस विषय पर भोजपुरी में एक फिल्म 'नजरिया तोहसे लागी' बन चुकी है जिसे भोजपुरी में 6 अवॉर्ड मिल चुके हैं।

पकडुआ विवाह का कारण

डॉ. अरुण कुमार बताते हैं कि पकडुआ विवाह दहेज प्रथा के कारण शुरू हुआ। आज भी बिहार में जब लड़की पक्ष वाले किसी लड़के के घर जाते हैं, तो उसके माता-पिता दहेज में 5 से लेकर 20 लाख तक की मांग करते हैं।

हालांकि पहले 10 हजार से लेकर 1 लाख रुपए की मांग करते थे। यह मांग लड़के की नौकरी, शि‍क्षा और परिवार की स्थिति के आधार पर तय की जाती है जिसे लड़की पक्ष वाले देने में असमर्थ होते हैं। इसी के खि‍लाफ सबसे पहले समस्तीपुर में ही आवाज उठाई गई और लड़के का अपहरण कर लड़की की शादी कराई गई।


इस तरह एक मध्यम परिवार की लड़की की शादी उच्च परिवार में हुई। इसके बाद से ही यह रिवाज मैथली भाषायी क्षेत्र के साथ अन्य क्षेत्रों में शुरू हो गया और आज यह प्रचलन बन गया है।

दिल्ली में राजनीति का नायक

नई दिल्ली। वर्ष 2001 में बनी बॉलीवुड की फिल्म 'नायक' फिल्म आपको याद होगा ही। उसके एक दृश्य में अमरीश पूरी फिल्म के नायक अनिल कपूर से एक साक्षात्कार में कहते हैं कि किसी भी राज्य की सरकार चलाना कोई बच्चों को खेल नहीं हैं। मैं तुम्हे 24 घंटे का समय देता हूं, तुम राज्य में व्याप्त बुराईयों को दूर करके दिखाओ। जब अनिल कपूर दोस्तों से राय के बाद तैयार हो जाते हैं तो अमरीश पूरी कहते हैं कि कर लेने दो इसे एक दिन की राजनीति। इसके बाद ही इसे मालूम चलेगा की किसी नेता की लिए सरकार चलाना कितना कठिन होता है और फैसला लेना भी।
                                                      
जब अनिल कपूर 24 घंटों में ही राज्य की व्यवस्था को सुधार कर राजनीति को नया मोड़ देते हैं तो अमरीश पूरी को अपने फैसले पर पछतावा होता है। दिल्ली की वर्तमान हालत फिल्म नायक की राजनीति की तरह ही है जहां नायक अरविंद केजरीवाल हैं ओर खलनायक कांग्रेस और भाजपा दोनों हैं। ए‍क तरफ जहां फिल्म में नायक खलनायक के विधायकों के समर्थन से सरकार बनाता है तो वर्तमान दिल्ली विधानसभा में आप पार्टी कांग्रेस के 8 विधायकों के सहयोग से सरकार बनाने जा रही है।

फिल्म की तरह ही वर्तमान सरकार में खलनायक की भूमिका निभा रहे कांग्रेस और भाजपा ने आप पर आरोपों की झडी लगा दी है। फिल्म में जहां नायक को सरकार बनाने के लिए केवल 24 घंटे मिले थे तो दिल्ली के आज के खलनायकों ने नायक को पांच साल दिएं हैं सरकार बनाने के लिए और राज्य की व्यवस्था को सुधारने के लिए। कांग्रेस तो चुनाव के बाद आप को बिना शर्त समर्थन देने के लिए उप राज्यपाल के पास चिठ्ठी लिखी और आज जब आप पार्टी सरकार बनाने जा रही है तो पार्टी के कुछ नेता कह रहे हैं कि हमने केवल वादों के आधार पर आप को समर्थन दिया है।

कांग्रेस का कहना है कि अगर आप अपने सभी वादों को पूरा नहीं करती है तो वो सरकार से समर्थन वापस ले लेगी, वहीं दुसरी तरफ कुछ कांग्रेसी आप को समर्थन देने के लिए पार्टी का विरोध कर रहे है। पार्टी का कहना है कि अगर आप जनता से किए गए वादों को तय समय सीमा में पूरा नहीं करते हैं तो कांग्रेस बेझिझक उनसे समर्थन वापस ले लेगी।

वहीं आप के दूसरे खलनायक भाजपा ने आप पर आरोप लगाते हुए कहा है कि जब केजरीवाल अपने बच्चों की कसम खाने वाले वादों को तोड़ सकते हैं तो सरकार बनाने के बाद वो दिल्ली की जनता को भी भूल सकते हैं। फिल्म नायक के साक्षात्कार वाली दृश्य में अनिल कपूर ने कहा था कि उन्होंने कभी सोंचा है कि वो राजनीति में आएंगे। अरविंद की आप पार्टी भी केवल एक साल ही पूरानी है।

दिल्ली के वर्तमान खलनायकों को समझना चाहिए की जब जनता और आपने उन्हें सरकार चलाने के लिए एक मौका दिया है तो चुपचाप पांच सालों तक उनके द्वारा किए जा रहे कार्यो का समीक्षा करें और जब वे अपने वादों को पूरा नहीं करते हैं तब आप चुनाव में उनको सबक सिखाएं। आप किसी भी व्यक्ित से अचानक उम्मीद नहीं कर सकते की वो देश की सभी जनता की उम्मीदों पर पूरी तरह से खरे उतर सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि केजरीवाल पहली बार सरकार बनाने जा रहे हैं। अगर वो पूरी तरह से सरकार बनाने में सफल रहते हैं तो दिल्ली और केंद्र से भाजपा, कांग्रेस और अन्य भष्ट्राचारी पार्टी का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। इसके लिए आप को पूरे पांच सालों तक अपनी छवी को दाग साफ रखना पडेगा, जैसा की फिल्म में दिखाया गया है।

फिल्म के अन्य दृश्यों के अनुसार आप सरकार पर भी उनके खलनायक हर समय उन्हें गलत रास्तों पर लाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाएंगे, मगर आप और केजरीवाल को अपनी दृढ़ता से उनका सामना कर अपने आर्दशों पर ही बने रहना होगा, वरना जनता व खलनायक उनका वहीं हाल करेगी जो एक नायक खलनायक का करता है।


  दिल्ली में आप की बनने वाली सरकार का। आप को सबक सीखाने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ही  पूरी तरह से तैयार हैं कि किसी राज्य की सरकार चलाना आसान नहीं है।