Friday, 16 May 2014

नीतिश कुमार का आस्तित्व अब हाशिए पर

राकेश कुमार

लोकसभा चुनाव 2014 के परिणाम सबको चौकाने वाले रहे। भाजपा ने जहां अकेले ही 282 सीटें जीत ली, वही वह सहयोगी दलों के साथ मिलकर 335 का आकंडा भी पार कर गई। भारतीय चुनाव की इतिहास में यह शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि लगातार 10 सालों तक केंद्र में राज करने वाली कांग्रेस केवल 44 सीटों पर ही सिमट कर रह गई। कई राज्‍यों में तो भाजपा ने कांग्रेस का सुफड़ा ही साफ कर दिया है और विरोधियों को उनके घर में घुस कर उन्‍हें मात दी है।

बात करें उत्‍तरप्रदेश, बिहार और झारखंड की तो, भाजपा ने अपने इतिहास में सबसे बड़ी जीत दर्ज करते हुए इन तीनों ही राज्‍यों के विरोधियों को शून्‍य पर लाकर खड़ा कर दिया है। उत्तरप्रदेश में जहां भाजपा ने 80 में से 73 सीटें जीती वहीं सपा केवल 5 सीटें जीत पाई, वह भी केवल अपने परिवार के बदौलत। यहां बसपा का खाता भी नही खुला हालांकि कांग्रेस ने दो सीटों पर बाजी मारी जिसमें अमेठी और रायबरेली सीट शामिल है।

वहीं बिहार में तो एक तरह से भाजपा ने जदयू को अर्श से फर्श पर ला दिया है। कुशासन की बात करने वाली  और लोकसभा चुनाव 2009 में 20 सीटें जीतने वाली जदयू अपने ही राज्‍य में अपना आस्तित्‍व तक नहीं बचा पाई और 40 सीटों में से केवल 2 सीटें जीत पाई जिसके बारे में नीतिश कुमार  ने कभी सपने में भी नहीं सोंचा था। वहीं भाजपा ने 31 सीटों पर बाजी मार ली। सबसे चौकाने वाला परिणाम राजद के लिए रहा क्‍योंकि उन्‍होंने कुल 4 सीटें जीत कर कांग्रेस व जदयू को अंगूठा दिखा गए।

झारखंड में भी भाजपा ने 14 लोकसभा सीट में से 12 पर कब्‍जा जमा लिया है। अब इन राज्‍यों में भाजपा का प्रभाव ज्‍यादा हो गया है और क्षेत्रिय पार्टियों को मुंह दिखाने लायक भी नहीं छोड़ा है। यहां तक की, वो अब चाहकर भी भाजपा व एनडीए में शामिल में नहीं हो सकते। अब वो अपने आप को कोस रहे होगें कि ये मैने क्‍या किया।

सबसे बड़ा झटका मोदी के धूरविरोधी नीतिश कुमार को लगा है। नीतिश कुमार के कारण ही जदयू ने 15 जून 2013 को भाजपा के अपने 17 साल के पुराने रिस्‍ते को ताक पर रख उससे अपना नाता यह कह तोड़ दिया था कि अगर भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री बनाती है तो हम भाजपा के साथ नहीं रह सकते। नीतिश पर इस लोकसभा चुनाव में हार का खामियाजा 2015 में राज्‍य में होने वाले विधानसभा पर पड़ सकता है। अब राज्‍य में जदयू की सरकार भी खतरे में पड़ गई है, अगर उसके कुछ विधायकों ने उनका साथ छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया तो इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

अब नीतिश कुमार के पास केवल दो ही रास्‍ते बचें है। एक तो वो भाजपा से माफी मांगते हुए एनडीए में शामिल हो जाएं और राज्‍य व केंद्र में अपने व अपनी पार्टी का आस्तित्‍व बचाने का प्रयास करें, जो संभव नहीं दिखता है। नीतिश कुमार के पास दूसरा रास्‍ता यह है कि वो अपने फैसले पर पूर्नविचार करें और इस हार में कहां कमी रह गई है उसे दूर करने की जितनी जल्‍दी प्रयास करें, उनके लिए सार्थक होगा। वहीं वो केंद्र में मोदी की सरकार के साथ भी सकारात्‍मक सोंच दिखाकर अपनी राजनीतिक अनुभवों के आधार पर राज्‍य को एक नई पहचान दें, तो शायद राज्‍य की जनता उन्‍हें माफ कर दे।


हालांकि ऊपर की दोनो ही परिस्तिथियों में नीतिश कुमार इतनी जल्‍दी सफल नहीं हो पाएंगे। ऐसी स्थिति में राज्‍य के 2015 में होने वाले चुनाव में इस हार की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है और बिहार के इतिहास में कभी राज्‍यसत्‍ता में नहीं नहीं आने वाली भाजपा चुनाव जीत कर राज्‍य में सरकार बना सकती है। इस तरह नीतिश कुमार अकेले पड़ जाएंगे, जो ना सरकार में रह पाएंगे और न विपक्ष में। अब फैसला नीतिश कुमार को करना है कि वो कौन सा कदम उठाते हैं और कौन सी रणनीति के तरह चुनावी मैदान में आते हैं।