Sunday, 8 November 2015

अहंकार ने बदली बि‍हार की तस्‍वीर

राकेश कुमार

 अहंकार इंसान को गलत रास्‍ते पर ले जाती है और उसका परि‍णाम हमेशा ही गलत होता है। 08 नवंबर 2015 को बि‍हार वि‍धानसभा चुनाव परि‍णाम भी इसी का उदाहरण है जहां भाजपा जैसी राष्‍ट्रीय पार्टी को 2014 लोकसभा में मि‍ली अप्रयासि‍त जीत ने इसतरह अहंकार में ला दि‍या कि‍ एकतरफ जहां बीजेपी 2014 में ही दि‍ल्‍ली वि‍धानसभा का चुनाव हार गई थी और अब बि‍हार में भी उसकी करारी हार हुई है। वहीं दूसरी तरफ बि‍हार नीतीश कुमार ने चुनाव की शुरुआत लोकसभा चुनाव में मि‍ली करारी हार से सबक लेते हुए उसी समय से कर दी थी जि‍सके परि‍णाम स्‍वरूप आज जदयू महागठबंधन को बि‍हार में पूर्ण बहुमत मि‍ला।

 भाजपा की इस हार ने जहां बीजेपी को बैकफुट पर ला खड़ा कर दिया है वहीं मोदी और भाजपा विरोधियों को एक बार फिर साथ खड़े होने का मौका दे दिया है। कांग्रेस जैसी राष्‍ट्रीय पार्टी जो कभी भी बिहार विधानसभा चुनाव में 10 से ज्‍यादा सीटें नहीं जीत पाती थी, उसने भी भाजपा को अपनी ताकत दिखा दी है। महागटबंधन की इस जीत ने कई भाजपा विरोधियों को अपने तरफ खिंचने में सफल होती जा रही है जो भविष्‍य में केंद्र में भाजपा के मुश्किले खड़ी कर सकता है। लालू प्रसाद ने पहले ही धोषण की दी है क‍ि बिहार फत‍ह के बाद अब दिल्‍ली की बारी है।

 इस चुनाव में भाजपा से कई महत्‍वपूर्ण गलति‍यां की जि‍सके कारण जहां बीजेपी, जो 2009 वि‍धानसभा चुनाव में अकेले ही 90 से ज्‍यादा सीटें जीत पाई थी, ने अपने सहयोगी दलों के साथ भी 80 के ऑकड़ों को पार नहीं कर पाई।
1.     
    डीएनए मामला: वि‍धानसभा चुनाव शुरु होने से पूर्व देश के पीएम मोदी द्वारा बि‍हार के मुजफ्फरपुर में एक सभा को सबोंधि‍त करते हुए कहा था कि‍ बि‍हार की जनता का डीएनए खराब हो गया है जि‍सके बाद पीएम मोदी की काफी आलोचना हुई। बि‍हार की जनता सहि‍त देश की जनता पीएम मोदी द्वारा दि‍ए गए इस तरह की भाषणबाजी से काफी नाराज हुए। जदयू और राजद सहि‍त सभी वि‍पक्षी पार्टियों ने मोदी से बि‍हार की जनता से तुरंत मांफी मांगने को कहा मगर भाजपा ने इससे इंकार कर दि‍या। जि‍सका खामि‍याजा मोदी को चुनाव में उठाना पड़ा।
2.        
    दि‍ल्‍ली की हार से सबक ना लेना: 2014 में लोकसभा चुनाव की तुरंत बाद ही दि‍ल्‍ली में वि‍धानसभा का चुनाव हुआ जि‍समें बीजेपी की करारी हार हुई थी। भाजपा तथा मोदी-अमि‍त शाह की टीम ने इस हार से सबक नहीं लि‍या और दि‍ल्‍ली की जनता को ही इसका जि‍म्‍मेदार बताया। साथ ही इस हार की ठीकर बीजपी मुख्‍यमंत्री की उम्‍मीदवार कि‍रण बेदी के सर फोड़ अपना पल्‍ला छाड़ लि‍या जि‍सका गलत असर भारत की जनता पर हुआ।

   3.     मुख्‍यमंत्री का उम्‍मीदवार घोषि‍त ना करना: दि‍ल्‍ली वि‍धानसभा चुनाव से पूर्व बीजेपी ने कि‍रण बेदी का अपना उम्‍मीदवार घोषि‍त कि‍या था जो चुनाव तक हार गई थीं। इस बार भाजपा ने बि‍हार चुनाव में बि‍ना मुख्‍यमंत्री उम्‍मीदवार के मैदान में उतरने की सोंची जि‍सका गलत परि‍णाम बि‍हार की जनता तथा मीडि‍या पर पड़ा। भाजपा ने बि‍हार में दि‍ल्‍ली की तर्ज पर मोदी और अमि‍त शाह पर वि‍श्‍वास कर चुनाव लड़ा जिसका परि‍णाम बि‍हार की जनता ने उन्‍हें सत्‍ता से काफी दूर रखाा।
4.
             भाजपा द्वारा स्‍थानीय नेताओं पर वि‍श्‍वास ना करना: भाजपा ने इस चुनाव में अपने ही पार्टी के स्‍थानीय नेताओं पर वि‍श्‍वास नहीं कि‍या जि‍सके कारण पार्टी में अंदरुनी गति‍रोध बना रहा और स्‍थानीय नेता खुलकर कोई प्रचार नहीं कर पा रहे थे। भाजपा की राष्‍ट्रीय टीम बि‍हार में पूरी तरह से मोदी, अमि‍त शाह, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, सुशील मोदी, रामविलास पासवास   तथा मांझी पर ही टिकी रही। वहीं महागंठगंधन ने पूरी तरह से नीतीश कुमार और लालू यादव को आगे रखकर चुनाव लड़ा।
5.
              नीतीश कुमार के खिलाफ कोई योजना नहीं बनाना: भाजपा की सबसे बडी चुनौती रही नीतीश कुमार के खिलाफ कोई योजना नहीं बना पाना और ना ही उनके खिलाफ जनता को आक्रोशित करना। मोदी और अमित शाह की पूरी टीम लालू यादव और जंगलराज पार्ट-2 को ध्‍यान में रखकर चुनाव प्रचार किया जिसके कारण उनकी रणनीति कारगर शाबित नहीं हुई। वहीं नीतीश कुमार ने पूरी तरह विकास को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा।


Friday, 28 August 2015

आरक्षण की आग में झुलसता आम भारतीय

राकेश कुमार

 आज पूरा भारत आरक्षण की आग में झुलस रहा है। देश के सभी क्षेत्रों में समय-समय पर अपने जाती को विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण देने की मांग को लेकर लगातार आंदोलन करते रहते हैं जिससे भारत की अर्थव्यवस्था अस्थिर हो जाती है। गुजरात हो या महाराष्ट्र, राजस्थान हो या पंजाब, आज इनहीं क्षेत्रों में आरक्षण की मांग ज्यादा हो रही है और अपनी मांगे मनवाने के लिए लगातार आंदोलन कर राज्य सरकार पर दबाव बनाया जाता है।

 लेकिन क्या आपको मालूम है कि इस जाती आधारित आंदोलन की आग में सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता को होता है। ऐसी आम जनता है जो एक वक्त के भोजन के लिए दिन-भर भागादौड़ कर कुछ जरुरी समाग्री व पैसे एकत्र करते हैं। उन्हे यह भी नहीं मालूम की देश में क्या हो रहा है।

भारत में आरक्षण की शुरुआत 18वीं सदी के मध्य में हुआ। पूरे दक्षिण भारत में हो रहे जातीय समीकरणों और निचले तबके को समाज के विशेष स्थान दिलाने के लिए चल रहे आंदोलन के बाद तत्कालिन ब्रिटिश शासक ने कई आयोग बनाए जिनहोंने भी शिक्षा, नौकरी तथा अन्य क्षेत्रों में आरक्षण की मांग को सही ठहराया।

 महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण का प्रारम्भ किया था। कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों/समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए 1902 की अधिसूचना जारी की गयी थी। यह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है।

 19वीं सदी के मध्य में भारत में तो जैसे देश में आरक्षण की मांग की बाढ़ आ गई। देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले अनुसुचित जाती और जनजातीयों ने अपने लिए शिक्षा और नौकरी के सभी क्षेत्रों में आरक्षण की मांग शुरु हो गई जिसको लेकर देश में सभी जातीयों ने व्यापक स्तर पर आंदोलन चलाएं गए। इन आंदोलनों में कभी-कभी आंदोलन कारियों और सरकार में झड़प भी हुई तथा सरकारी संपत्ती को काफी नुकसान पहुंचा। इन सभी आंदोलनों के कारण देश की वैसी जनता पर खासा असर पड़ता है जो एक वक्त की रोटी की व्यस्था के लिए दिनभर नौकरी की तलास में रहते हैं।

 भारतीय गरीबों के पास ना तो रहने के लिए पक्का छत है, ना ही अपने बच्चो को स्कूलों में पढ़ाने के लिए पैसे और ना ही भरपेट भोजन की व्यवस्था। भारत के सर्वेक्षण रिपोर्ट 2014 के अनुसार भारत में कुल आबादी की लगभग 30 फीसदी आबादी गरीबों की है जिनकी दैनिक आय 22 रुपए से भी कम है और वो दूसरों पर आश्रीत हैं। ऐसे लोगों को जाती और धर्म से उतना लगाव नहीं होता है। अगर असल देखा जाए तो आरक्षण की मांग इन्ही गरीबों को करना चाहिए और आरक्षण भी इन्हें ही मिलना चाहिए।

 फिर प्रश्न यह उठता है कि क्या रोजाना पार्टी करने वाले, पक्के मकानों में रहने वाले, दो-चार पहियों पर घुमने वाले, निजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले, होटलों में खाना खाने वाले तथा रोजाना मौज-मस्ती करने वाले लोगों व जातियों को आरक्षण क्यों दिया जाय और वो इसकी मांग क्यों करते हैं। ऐसे लोग गरीबो के मसीहा बनकर उनका हक मारना जानते हैं।

 आज जिस तरह से आरक्षण की मांग के लिए जाट, गुर्जर, पटेल, मुस्लमान अन्य पिछड़ा वर्ग आंदोलन कर रहा हैं उसके कारण राज्य व शहर की अर्थव्यवस्था खराब हो जाती है। रोजमर्रा के वस्तुओं के कमी के कारण उसके दामे बढ़ जाती है, यातायात सेवाएं ठप हो जाती है तथा छोटे-छोटे संस्थान बंद हो जाते हैं जिसके कारण इन संस्थानों पर आश्रित लागों का रोजगार छिन जाता है और वो अपने घरो में बैठने को मजबुर हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसे लोग इन आदोलनों की भेंट भी चढ़ जाते हैं जिनके कारण कई घरों के चुल्हे सदा के लिए बंद हो जाते हैं और वो दर-दर भीख मांगने को मजबुर हो जाते हैं।

 फिर प्रश्न यह उठता है कि क्या सरकार को आरक्षण की मांग कर रहे समुदायों को ऐसे आंदोलन करने की अनुमती देना चाहिए? क्या आज के पढ़े-लिखे लोगों को सरकार से अपने हक की लड़ाई में दूसरों का हक मारने का अधिकार है? क्या आरक्षण की मांग करने वाले लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं? इन सभी सवालों का केवल एक ही जवाब है नहीं।


 भारत में सभी लोगों को यह हक है कि वो अपने हक की मांग करे और उसके लिए अवाज उठाए, मगर शांति ढंग से, हिंसा से नहीं। दूसरो के जीने का अधिकार छिनकर नहीं। अपनी अधिकारों की लड़ाई में दूसरों का अधिकार छिनने का अधिकार भारत में किसी को नहीं है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे भारतीय दंड सहिंता की विभिन्न धाराओं के तहत दंड दिया जा सकता है। इसलिए यह विषय सोचने योग्य है।

Friday, 12 June 2015

इंतजार की हद कहां तक?

राकेश कुमार


  एक कहावत है ‘इंतजार का फल मीठा होता है’। वाकई, इंतजार का फल मीठा होता है मगर ज्यादात्तर समय इसका अनुभव कड़वा ही होता है। इंतजार बहुत ही छोटा शब्द हैं मगर इसका अर्थ बहुत ही बड़ा होता है। जैसे समुद्र तो लिखने और पढ़ने में बहुत ही छोटा होता है मगर जब हम उसे वास्तवीक रुप में देखते हैं तब मालूम होता है कि समुद्र क्या है। ठीक वैसा ही ये इंतजार शब्द।

  मगर क्या आपको मालूम है लोग इंतजार शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं तो आप कहेंगे, किसी कार्य का हल निकालने या अपने कार्य से छुटकारा पाकर आपसे मिलने के लिए। मगर ये उत्तर गलत है क्योंकि इस शब्द का ज्यादा प्रयोग लोग किसी चीज से पीछा छुड़ाने के लिए करते हैं और कुछ लोग आपका मज़ाक उड़ाने के लिए।

  अंग्रेजी के वेट् शब्द का हिन्दी अनुवाद है इंतजार, जो 18वीं शताब्दी में उस समय आया जब अंग्रेजी से हिन्दी शब्दकोष का निर्माण हुआ। इंतजार दो भाषाओं के दो शब्‍दों से मि‍लकर बना है संस्‍कृत के इत और उर्दू के ज़ार शब्‍द से। संस्‍कृत में इत का अर्थ होता है – थोड़ा सा और उर्दू के ज़ार का अर्थ होता है रुकावट, रुकना। इन दोनों शब्‍दों को जोड़ने से बनता है इंतजार, जि‍सका अर्थ होता है थोड़ा रुकना।

  उस दौरान इस शब्द का प्रयोग प्रतिक्षा करने जैसे शब्द के बदले में आया। प्रतिज्ञा शब्द कुछ ज्यादा ही कठोर शब्द है जिसे कहने पर सामने वाले व्यक्ति को बुरा भी लग सकता है मगर इंजतार शब्द बहुत ही व्यवहारिक शब्द है।

  आपका पाला अक्सर इस शब्द से पड़ता है। रेलवे का टिकट हो या बस का टिकट, होटल में खाना खाना हो या उसका बिल ज्मा करना, नौकरी ढूंढना हो या पढ़ाई करने के लिए अच्छे संस्थान चुनना, अपने परीक्षा का परिणाम जानना हो या फिल्म के लिए टिकट खरीदना हो, बिल जमा करना हो या नया कनेक्शन लेना हो, सभी जगह इंतजार करना पड़ता है।
  
  आज इस शब्द का सबसे ज्यादा मजाक उड़ाया जाता है। जब आप अपने परीक्षा के परिणाम जानने के लिए संस्थान पहुंचते हैं, जब आप किसी संस्था में नौकरी के लिए जाते हैं, किसी अच्छे संस्थान में दाखिला देने के लिए जाते हैं या किसी सरकारी अस्पताल में अपनी बिमारी का ईलाज कराने के लिए जाते हैं, सभी जगह बस इसी शब्द का प्रयोग किया जाता है क्योंकि वे सभी आपका कार्य करने से परोक्ष रुप से मना नहीं कर सकते, इसलिए आपसे कहते हैं कि आप कुछ पल इंतजार करें, आपका कार्य हो जाएगा, मगर कब होगा ये नहीं बताते। अंतत: आप स्वयं उस स्थान को छोड़ देंगे या हट जाएंगे।

  ये तो फिर वैसे भी बात हो जाती है जब आप किसी संस्थान में नौकरी प्राप्त करने के लिए साक्षात्कार के लिए जाते हैं। आपके साक्षात्कार के बाद आपसे कहा जाता है कि आप बाहर इंतजार करें या आपको कुछ दिनों में परिणाम बता दिया जाएगा, मगर आपका इंतजार खत्म नहीं होता और आखिरकार अपने आप से ये सवाल करते हैं कि क्या वाकई इंतजार का फल मीठा होता है? क्या वाकई इंजतार करना सही होता है?, क्या उनके लिए हमारे समय की कोई कीमत नहीं है? इन्हीं सभी प्रश्नों के उत्तर खोजते समय आप नकारात्मक हो जाते हैं। मगर अभी भी आपको उस परिणाम का इंतजार होता है।

  आखिर में फिर वहीं सवाल रह जाता है कि क्या वाकई इंतजार का फल मीठा होता है? क्या दूसरों का समय हमारे समय से ज्यादा महत्वपूण होता है? क्या उनकी नजर में हमारी वैल्यू कुछ नहीं होती? आखिर हम कब तक इंतजार करें, कब हमारे सब्र का बांध टूटेगा और हम कहेंगे, बस अब नहीं कर सकते और इंतजार। मगर ये भी सच्चाई है कि हम ये शब्द नहीं कह सकते क्योंकि कहीं ना कही व किसी ना किसी रुप में हम दूसरों पर निर्भर होते हैं और हमारा कार्य उनके बिना नहीं हो सका। इसलिए हमे इंतजार करना होगा और ऐसा भी हो सकता है कि ये इंतजार कुछ लंबा ही करना पड़े। मगर ये बात जरुर सही है कि आप जितना इंतजार करेगें, लोग आपसे उतना ही इंतजार कराएंगे और कहेंगे, बेटा इंतजार का फल मीठा होता है।

धन्यवाद 

Monday, 8 June 2015

सॉरी शब्द: उपयोग और इसके मायने

राकेश कुमार

   सॉरी, पूरे विश्व में यह आज बहुत ज्यादा प्रचलित और प्रयोग किए जाने वाला शब्द है। आप किसी भी घटना, दुर्धटना के बाद इस शब्द को बोल कर आप बच कर निकल सकते हैं और सामने वाला पीड़ित व्यक्ति भी केवल इस छोटे से शब्द बोलने से ज्यादा प्रभावित हो जाता है। मगर आजकल इसका प्रयोग कुछ ज्यादा ही होने लगा है और इसके मायने भी बदल गए हैं।
आज लोग किसी को जानबुझ कर मारपीट कर, हत्या कर, छेड़कर, प्रताड़ित कर, धक्का देकर, विवादित टिप्पणी कर या फिर ऐसे भी बहुत सारी घटनाओं को के बाद उससे बचने के लिए इस तरह के शब्द बोलते हैं और बचकर निकल जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि वह व्यक्ति जिसने उस घटना के बाद सॉरी बोला है, उसके बाद उसने उस तरह की घटनाओं से दूर हुआ है या ऐसी घटनाएं दुबारा नहीं दुहराता है?

   आपका जवाब होगा नहीं। तो फिर लोग इस तरह के शब्द क्यो बोलते हैं?, क्या वो इसका मतलब नहीं जानते या इसका महत्व नहीं जानते, या फिर जानबुझ कर दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने के लिए करते हैं। तो आइए आज हम आपको बताते हैं इसके मायने और अर्थ।


  सॉरी शब्द पूरे विश्व में 20वीं सदी में प्रचलन में आया। इसकी शुरुआत ऑस्ट्रेलिया से 26 मई 1998 को उस समय हुआ जब ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जॉन हॉवर्ड अपनी संसद को संबोधित करने के दौरान एक सांसद के प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे, तभी एक गलती की माफी मांगने के दौरान अचानक ही उनकी मुख से सॉरी शब्द निकल पड़ा। इस तरह सॉरी शब्द की उत्पति हुई। यानी सॉरी शब्द राजनीति में अपनी गलतियों पर माफी मांगने के लिए हुई।

  श्री जॉन हॉवर्ड ने सॉरी शब्द के मायने और अर्थ समझाते हुए कहा कि अनजाने में की गई कोई गलती के बाद जब उसका एहसास हो कि मैने यह गलती कर दी, उसे जल्द से जल्द सुधारा जा सकता है तो आप सॉरी बोलकर सभी से क्षमा मांग सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई व्यक्ति कोई गलती, जिसका उसे ज्ञान नहीं है, करता है तो वह सॉरी बोल कर अपनी गलतियों को सुधार सकता है। इसके बाद ही इस शब्द का प्रयोग पूरे विश्व में फैल गया।

  आजकल की भाग-दौड़ भरी जीदंगी में हर व्यक्ति जल्दी में रहता है और दूसरों को आगे निेकले का प्रयास करता रहा है। इस दौरान ना जाने वह कितनों को कई बार धक्का दिया हो, नुकसान पहुंचाया होगा, मगर हर बार वो उसे सॉरी बोलकर और अपनी गलतियों को नजरअंजाद कर आगे निकल जाता है। ऑस्ट्रेलिया में बढ़ रही ऐसी ही घटनाओं के बाद वहां की संसद ने वर्ष 2008 में 26 मई को राष्ट्रीय सॉरी दिवस मनाने की घोषणा कर दी। उस दिन लोगों की कोशिश यह रहती है कि सॉरी शब्द का प्रयोग कम से कम या ना के बराबर करें।

  आज जरुरत है हमें भी कुछ ऐसा करने की जिससे पूरा जनसमुदाय इस शब्द के मायने और अर्थ को समझ कर सॉरी बोलने से पहले एक बार सोचें और अपनी जीदंगी में इस तरह के शब्दों का कम से कम प्रयोग करें। 
धन्यवाद

Saturday, 21 March 2015

बिहार की शिक्षा पद्धति पर उठते सवाल

-राकेश कुमार
बिहार में भी इन दिनों बोर्ड की परीक्षा चल रही है। इस परीक्षा में बैठने वाले छात्र का भविष्य इस बात पर टिका है कि वो इस परीक्षा को अच्छे अंक से पास करें तभी उन्हें किसी अच्छे कॉलेज या कोर्स में दाखिला मिल सकता है। लेकिन, इन दिनों बोर्ड परीक्षा में हो रही नकल ने न सिर्फ नकलची छात्रों बल्कि राज्य के प्रतिभाशाली छात्रों की योग्यता को भी संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। हालांकि इस बीच, नकल के मामले में 760 छात्रों को निष्कासित कर दिया है, जबकि 8 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया है।

बोर्ड परीक्षा में चल रही खुलेआम नकल से प्रदेश की शिक्षा प्रणाली पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है। अब तो लोग सवाल उठाने लगे हैं कि क्या बिहार में लोग ऐसे ही आईएस और आईपीएस बनते हैं? संभवत: 2004 के बाद इतने बड़े पैमाने पर खुलेआम धांधली की रिपोर्ट पहली बार आई है। 2004 में सात दिनों के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने परीक्षा के समय सभी परीक्षा केन्द्रों की वीडियोग्राफी कराने, शिक्षकों को छात्रों के साथ कड़ाई से पेश आने तथा भारी संख्या में पुलिस फोर्स तैनान करने का आदेश दिया था। इसके बाद से ही राज्य में धांधली ना के बराबर हो गई थी। इस बर्ष बोर्ड परीक्षा में हो रही धांधली ने राज्य सरकार की कलई खोल दी है।

इन सभी प्रश्नों से बिहारवासियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। ऊपर से बिहार के शिक्षा मंत्री का यह बेतुका बयान कि सरकार इसे नहीं रोक सकती, हम पुलिस को अपने भाई-बहनों पर तो लाठी नहीं चलवा सकते ना?

जिम्मेदार कौन? : बिहार बोर्ड परीक्षा में हो रही नकल के लिए जिम्मेदार केवल सरकार ही नहीं, बल्कि अभिभावक भी हैं। सभी का सपना होता है कि उनका बच्चा हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करे। यह सपना कोई बुरा नहीं है। इस परीक्षा में तो छात्रों के अभिभावक ही नकल करा रहे हैं। छात्र भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। हालांकि पैसे देने के आरोप तो पहले भी लगते रहे हैं।

शिक्षा प्रणाली  : बिहार में 2005 में सरकार बदली, राजनीति का स्तर बदला, लोगों की सोच बदली मगर जो नहीं बदल सकी वो है हमारी शिक्षा पद्धति। बिहार बोर्ड की परीक्षाएं अब सीबीएसई पैटर्न पर होने लगी है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2005 में नियुक्ति किए गए हाई स्कूल शिक्षकों में से 90 फीसदी शिक्षकों को अपने विषय का ज्ञान ही नहीं है। वहीं पहले से कार्यरत स्कूल शिक्षकों सहित हाई स्कूल के शिक्षकों में से 50 फीसदी शिक्षक सिफारिश पर जॉब कर रहे हैं। दूसरी ओर कुछ अच्छे शिक्षक हैं, वो पढ़ाना नहीं चाहते। ऐसे में वहां कोचिंग संस्थानों की भरमार लगी है, जिनका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना रह गया है।

बिहार के बारे 2005 से पूर्व कहा जाता था कि यहां कोई भी पैसे व नकल से पास हो सकता है। मगर जैसे ही 2005 में जदयू की पूर्ण सरकार सत्ता में आई, परीक्षा का स्तर बदल गया। 2012 तक तो सबकुछ ठीक चला। मगर जैसे ही बिहार की राजनीति में अस्थिरता आई, वहां की शिक्षा व्यवस्था भी बेकार होती चली गई। शिक्षक अच्छे वेतन की मांग को लेकर धरना करने लगे, परीक्षा केन्द्रों की वीडियोग्राफी करने वाले भी अब केवल नाम के लिए वीडियोग्राफी करने लगे, स्कूल प्रबंधन भी ढीला पड़ गया।  ऐसे में परीक्षा को कदाचार मुक्त बनाने का सरकार का सपना महज सपना बनकर रह गया। आज जो बोर्ड परीक्षा की स्थित है, उसका कारण भी यही है।
अब हम कैसे अपने राज्य सरकार, शिक्षक और अपने अभिभावक पर विश्वास दिलायें कि परीक्षा में दिए जा रहे उनके अकारण सहयोग से हमारे ऊपर उसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है? हम कैसे अपने माता-पिता के सपनों को पूरा कर पाएंगे, उसका जवाब हमारे पास भी नहीं है और ना हमारे अभिभावक के पास।

बिहार की शिक्षण प्रणाली पर लगने वाला यह दाग समय रहते नहीं धोया गया तो वो दिन दूर नहीं जब अच्छे संस्थानों में बिहारियों के प्रवेश पर रोक लग जाए और वहां की सरकार की थू-थू हो।


Thursday, 5 March 2015

बलात्कार पर भारतीयों की मानसिकता !!


आज पूरे भारत में जिस विषय पर बिना वजह विवाद हो रहा है, चर्चा हो रहा है, वो वास्तव में कोई विवाद नहीं है। लेकिन इस विषय वर बिना किसी प्रयास के किया गया शोध का परिणाम यह निकलता है कि आज भी भारत में 90 फीसदी से ज्यादा ऐसे लोग हैं जिनकी मानसकिता गंदी है, उनकी सोच गंदी है। ऐसे लोगों की दो तरह की मानसिकता होती है- एक तो जो ऊपर से दिख रही है, जिसे आप प्रभावित होते हैं, उन्हें अच्छे व्यक्तियों में गिनते हैं। वहीं दूसरी मानसिकता जो परदे के पीछे होती है, जो दिखाई नहीं देती मगर अपना काम कर जाती है। अगर नहीं तो आज पूरे भारत में इस तरह के बवाल नहीं मचता।

आज अगर निर्भया जिंदा होती तो शायद इस तरह की गंदी राजनीति का हिस्सा बनने से पहले ही इस दुनिया से दूर चली जाती। वहीं केवल 5 फीसदी ऐसे लोग हैं जो खुलकर बोल रहे हैं जबकि 5 फीसदी वैसे लोग हैं जिन्होने कुछ नहीं बोला या वो सूनकर अनजान रह गए।

दरअसल भारत मे पिछले दो दिनों से एक डाक्युमेंट्री पर विवाद चल रहा है जिसे विदेश की एक मीडिया चैनल द्वारा शोध कर तैयार किया गया है, जो भारत में बलात्कार के आरोपियों की मानसिकता पर आधारित है। लेकिन शायद उस मीडिया चैनल वाले भी नहीं जानते होगें की वो जिस विषय पर शोध करके गए हैं, उससे अलग विषय पर बिना किसी शोध का परिणाम सामने आ गया है- वो विषय है- बलात्कार मामले पर बहस/शोध के बाद लोगों की सोच।

वैसे देखा जाय तो भारत के लोगों की मानसिकता को लेकर छिड़ी यह विवाद कोई नई नहीं हैं। भारतीय राजनेता, समाजसेवी, बड़े अफसर तथा कोई बड़ा धार्मिक व्यक्ति अक्सर इस तरह का बयान देते रहते हैं जिसमें वो समाज की महिलाओं और लड़कियों को निशाना बनाते हैं और उन्हें उनके खिलाफ आपत्तिजनक बयान देते हैं।

आज की इस 21 सदी में एक तरह जहां लोग बेटियों को बचाने, समाज में उसका मुख्य स्थान दिलाने व शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें शहर में रहकर पढ़ाई, नौकरी नहीं करने, शाम 7 बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकलने, मॉडन कपड़े नहीं पहनने तथा किसी लड़के के साथ नहीं घूमने की सलाह देते हैं।

एक समाचार संगठन द्वारा बलात्कार के आरोपी के वकिल से बात की तो उन्होंने भी अपनी मानसिकता अच्छी ही दर्शायी। उनका कहना है कि अगर मेरी बेटी या बेटी इसत तरह किसी अनजान लड़के/लड़की की साथ रात में अकेले घूमते हुए पाए जाते तो मैं उसकी हत्या कर देता। मुझे लगता है शायद उन्हे ये काम अभी कर देना चाहिए क्योंकि वक्त का कोई भरोसा नहीं, किस तरफ हवा का रुख मोड़ दे और वो बाद में अपनी बातों से पलट जाएं।

लेकिन मैं ऐसे लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूं की क्या घर मैं कैद कर किसी लड़के या लड़की को अच्छा संस्कार सिखा सकते हैं, उन्हें अच्छी शिक्षा दिला सकते हैं? क्या वो अपने बच्चों को आत्म निर्भर बना रहे हैं? बड़े लोग तो शायद अपने बच्चों को विदेश भेज कर उस तरह के प्रश्ननों से बच भी जाएं लेकिन क्या वो जानते हैं कि उनके बच्चे विदेशों में क्या गुर खिला रहे है? तो शायद उनके पास इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं होगा, जो उनकी दोहरी मानसिकता को दर्शाती है।

एक प्रश्न और, वकिल साहब ने कहा कि अगर मेरे बच्चे रात के बारह बजे घर से बाहर मेरे से 
पूछकर बाहर जाएं तो मैं भी उनके साथ हो लूंगा। मगर क्या वो जानते हैं कि जिसके बच्चों के सर पर बाप या भाई का साया ना हो, तो फिर वो कहां जाएं किसी से सहारा मांगने? क्या उन्हें भरोसा है कि लड़कियों के बाहर जाते समय अगर परिवार का कोई सदस्य रात या दिन में कोई हो तो बलात्कार नहीं होंगे या इसतरह के मामले कम हो जायेगे? अगर वो इसतरह की सोच रखते हैं तो शायद मेरी उनको सलाह होगी की वो अपनी ज्ञान को थोड़ा और बढा़ए और समाचार चैनलों को देखने के बजाए समाचार-पत्रों को पढ़ा करें।

रही बात शोध की तो, शोध का तरीका सही रहा है और शोध का परिणाम भी सही रहा है। मगर एक चीज जो अलग रही है, इस शोध के बाद लोगों की सोंच, जो आज हमें स्पष्ट दिख रही है कि भारत के लोगों की क्या सोंच है? ..........



Tuesday, 3 March 2015

दहेज, समाज और सम्मान

राकेश कुमार  

भारतीय हिन्दू समाज में कई सदियों से दहेज प्रथा काफी प्रचलित है। इस प्रथा का प्रचलन इतना बढ़ा कि आज यह सभी समाज में फैल गया है। यह प्रथा खासकर देश के पूर्वी राज्यों (उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड के साथ उत्तराखंड) के कुछ जिलों में काफी प्रचलन में हैं। इस प्रथा में वर पक्ष वधू पक्ष से दहेज के रुप में पैसे लेना, अपना सम्मान समझते हैं। यानी जितना ज्यादा दहेज, उतना बड़ा सम्मान।

इस प्रथा के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य बिहार और उत्तरप्रदेश हैं। हालांकि बिहार का मैथली भाषी क्षेत्र और उत्तरप्रदेश का दिल्ली से सटे कुछ जिले इससे कम प्रभावित हैं। इन क्षेत्रों के लोगों का मानना हैं कि अगर आपने अपने बेटी/बहन/लड़की में दहेज के रुप में वर पक्ष को पैसे और उसके सुख-सुविधा के लिए समान नहीं दिए तो समाज में उसकी नाक कट जायेगी और उसे समाज में हीन भाव से देखा जायेगा।
दहेज शब्द का अर्थ है वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को अपने बेटी/लड़की/बहन की शादी के लिए पैसे और समान देना, जिससे वर पक्ष सहज स्वीकार कर अपने बेटे/भाई की शादी के लिए मंजूरी देता है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि लड़का जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा हो और किसी विभाग में सरकारी अफसर हो, उतना ही ज्यादा दहेज देना पड़ता है।

इन क्षेत्रों में होने वाली शादी में दहेज 4 लाख से 15 लाख रुपए तक पहुंच जाता है और फिर उसके साथ वर-वधु के आराम के लिए सभी तरह के बर्तन, महंगे कपड़े और ज्वेलरी, टीवी, फ्रिज, लैपटॉप तथा वाहन आदि समान साथ में देना होता है।  साथ ही शादी में होने वाले खर्च अलग से। यानी कुल मिलाकर एक मध्यम परिवार के लिए शादी में आज के समय में कम-से-कम 10 लाख रुपए पहुंच जाता है। इस तरह की ज्यादात्तर शादियां को मध्यम वर्ग का हरेक परिवार अर्फोड नहीं कर सकता है, इसलिए वो अपनी पुस्तैनी जमीन या तो बेच देता या या फिर उसे गिरवी रख देता है जिसके बदले में उसे कुछ पैसे मिल जाता है। कुछ लोग तो कर्ज लेकर इस तरह की शादियां करते हैं जिसे वो कभी अपनी जीदंगी में चुका नहीं पाते।

लोगों का मानना है कि अगर कोई इसका विरोध करता है तो फिर समाज में उसे हीन भाव से देखा जाता है, समाज उसके परिवार से दूरी बना लेता है। फिर उस घर में किसी भी प्रकार का शुभ-मांगलिक कार्यो का समाज बहिस्कार करता है। इसलिए कोई भी दहेज देने से मना नहीं करता। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अगर किसी प्रकार जोर-जबरदस्ती कर शादी कर दी जाती है तो फिर ससुराल पक्ष लड़की को काफी तंग करते हैं, उसे काफी मार-पीट करते हैं, यानी कुल मिलाकर कहें तो काफी प्रताड़ित करते हैं। कौन अपने ही घर की बर्बादी देखेगा, इसलिए कोई भी इस प्रथा का विरोध नहीं करता हैं।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह प्रथा कब तक जारी रहेगा, कबतक तो समाज के सम्मान की डर से इस तरह के कुप्रथाओं से बचकर निकलते रहेंगे, क्या हमारी शिक्षण प्रणाली और कानून इतने कमजोर हैं कि यह प्रथा सदियों से चली आ रही है, कबतक हम इस आग में जलेंगे और दूसरों को भी जलाएंगे?  क्या हमारा समाज हमें समाज से विद्रोह करने से रोक रहा है?

इसका जवाब होगा- हॉ। इसे रोकन के लिए हमें समाज को जागरुक करना होगा, खुद कदम बढ़ाना होगा, अगर समाज सामने खड़ा हो तो कानून का सहारा लेना होगा, अपने क्षेत्र में जागरुकता अभियान चलाकर लोगों को इस कुप्रथा के प्रभावों और इसके नाकरात्मक पहलुओं को बताना होगा, तभी हम इससे निजात पा सकते है। इसके लिए हमे मीडिया का सहारा अवश्य लेना होगा, वरना हमारी पुरी जागरुकता अभियान अधुरी रह जायेगी।

अब हमें युवाओं को आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा लव-मैरेज और कोर्ट मैरेज को बढ़ावा देकर दहेज जैसे कुप्रथाओं को दूर करना चाहिए।




Keywords:  समाज, दहेज, सम्मान, बिहार, शादियां


Monday, 2 March 2015

जदयू और नीतीश का आस्तित्व खतरे में !

राकेश कुमार
(राजनीति विश्लेषण )

किसी ने सच ही कहा है कि इंसान को इन दो चीजों का कभी भी लोभ नहीं करना चाहिए, एक है पैसा और दूसरा सत्ता। ये दोनों ही एक अच्छे भले इंसान को भाई तक से लड़ाई करा देता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है - बिहार के मुख्यमंत्री, जदयू के वरिष्ठ नेता और विकास पुरुष के नाम से पहचाने जाने वाले नीतीश कुमार।

हाल के दिनों में बिहार की राजनीति की दशा बदली है, उसके कारण है नीतीश कुमार की महत्वकांक्षा, सत्ता का लोभ और अपने आप में ज्यादा विश्वास। बिहार के एक छोटे से गांव में किसान के घर जन्में नीतीश कुमार गरीबी को अच्छी तरह जानते है। उन्होंने पटना कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही राजनीति में आ गए थे। वे जयप्रकाश नारायण की राह पर चलते हुए 2006 तक राजनीति में अपने ऊपर कोई आंच नहीं आने दिया और हर जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाया।

वर्ष 2004 में जब नीतीश कुमार 7 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होने अपनी ईमानदारी का छाप लोगों पर छोड़ दिया था। यही कारण है कि 2005 और 2010 में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो लोगों ने उनपर ज्यादा भरोसा दिखाया। 2010 में जब कुमार चुनाव जीते तो उन्हे अपने आप में और अपने फैसलों पर ज्यादा विश्वास होने लगा। उन्हे लगा कि इस बार चुनाव वो अपने दम पर जीते हैं ना कि पार्टी के दम पर। बस यहीं से उनकी राजनीतिक छवी खराब होने लगी। वो लगातार गलत फैसले लेते गए और 2014 में तो उन्होने अपनी जींदगी का सबसे बड़ा गलत फैसले लेते हुए भाजपा से अलग हो गए। इसे जदयू पार्टी का दूर्भाग्य कहें या नीतीश कुमार की, 2014 में हुए विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा।

इस बार के बाद बिहार की जनता का कहना था कि नीतीश कुमार के घंमड़ को तोड़ना बहुत जरुरी हो गया था। इसके बाद भी नीतीश कुमार हार से सबक नहीं ले सके और लोकसभा चुनाव में केवल तीन सीट ही जीत पाए। नीतीश कुमार के लिए यही वो समय था जब वो कुछ बड़े फैसले लेकर एक नई रणनीति तैयार कर 2015 के विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियां करते, मगर हुआ इसके उलट। उन्होने तो हार की जिम्मेदारी लेकर मुख्यमंत्री का पद तो छोड़ दिया मगर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया जो मौके की ताक में था।

नीतीश कुमार गलतियां करनें में यहीं तक नहीं रुके, वो अपने सबसे बड़े विरोधी लालू प्रसाद और कांग्रेस से नाता जोड़ लिया और तीसरे मोर्चे की तैयारी करने लगे। इसका फायदा उठाकर मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अपने लिए मैदान तैयार करना शुरू कर दिया और नीतीश कुमार को इसकी भनक तक नहीं लगी। और जब भनक लगी तबतक बहुत देर हो चुकी थी। जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार की राजनीति के लिए गड्ढा खोद चुके थे। नीतीश को लगा कि वो मांझी को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन जाएं, मगर मांझी ने इस्तीफा देने से इंकार कर कुमार के महत्वकांक्षा पर पानी फेर दिया। इसके बाद जदयू  में दो फाड़ हो गया, एक फाड़ नीतीश कुमार का और दूसरा मांझी।

अब बिहार की राजनीति यह है कि नीतीश कुमार चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री बन गए हैं मगर हकिकत यह है कि वो मांझी के बनाएं गड्ढे में गिरते जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लसकों के अनुसार इसमें कोई शक नहीं कि इस पूरे खेल के पीछे भाजपा का हाथ है। भाजपा ने मांझी का साथ देकर बिहार में महादलित वोट, अल्पसंख्यक वोट अपने पाले में कर लिया है जो अबतक जदयू का था। राजद भी भले ही जदयू के साथ है मगर उसका वोट जस-का-तस बना रहेगा। जबकि नीतीश कुमार का पूरी तरह से कट जाने की संभावना दिख रही है।

इस साल होने वाले चुनाव में अगर कोई चमत्कार ना हुआ तो जदयू का नीतीश कुमार की राजनीती का वहीं हस्त्र होगा जैसा दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस का हुआ। अब देखते हैं कि क्या नीतीश कुमार बिहार के जनता में पहले जैसा विश्वास जगा पाते हैं या जनता उन्हें सबक सिखाती है।

कभी तो हौसला कर

स्वाती तिवारी

कभी तो हौसला कर अपने परों पर, 
अकेला तो निकल अपने घर से
ये गुलशन, ये बागवां तेरा, 
ये जमीं ये आसमां तेरा
उतारनी तो होगी बर्गद की छांव अपने सर से
कभी अकेले तो निकल अपने घर से..........

ये सपने, ये जिन्दगी तेरी,
कभी रौशनी के साये, 
तो कभी रात अन्धेरी है।
मंजिल का मिलना तभी मुम्किन है, 
जब ना बहकेगा अपनी डगर से
 कभी तो हौसला कर अपने पर पे, 
अकेला तो निकल अपने घर से

मुझे तो लोगो ने बहुत समझाया, 
उल्टी-पुल्टी बातें कि, बहुत डराया।
कहा जिन्दगी इसी घौसले के अन्दर है, 
यही जमीन यही समन्दर है। 
कुछ नही मिला अकेले सफर से.......
फिर भी निकला हूं मैं घर से, 
कुछ तो भरोसा आया है अपने पर पे......

बस थोडा सा थका हूं पर, हारा नही हूं...
हां स्थिति अनुलकूल नहीं है पर, मै ठहरा नहीं हूं...
सांसे रुकी है पर धड्कन चल रही है।
ना जाने आज ये कैसा सवेरा हुआ, 

आंखे लगी भी नही, और खुली भी नही।
दिल अभी उड़ना सीखा भी नही था कि पैर डगमगा गए


जाने कहां ले जाएंगे ये घने बादल आज, 
लगता है बडी़ दूर से आये हैं किसी की तलाश में.........

Monday, 23 February 2015

ट्रैफिक सुरक्षा को लेकर हम कितने जागरुक !!

राकेश कुमार

जब भी सड़क पर जाम लगता है, दुर्घटना होती है और कुछ इसी तरह की गतिविधियां होती है तो सबसे पहले ट्रैफिक पुलिस और प्रशासन को दोष देते हैं और कहते हैं कि पुलिस और ट्रैफिक पुलिस कार्य नहीं करना चाहती। लेकिन क्या हम जानते हैं कि सड़क पर लगने वाले जाम और होने वाले दुर्घटना के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं?

जिला प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस तो हमेशा ही सड़कों पर लगने वाले जाम और दुर्घटना को रोकना चाहती है और इसके लिए वो समय-समय पर जागरुकता अभियान, सड़कों पर जागरुकता संदेश, आकाशवाणी, रेडियो तथा समाचार पत्रों के माध्यम से जागरुक करती रहती है। मगर हम उसपर कभी ध्यान नहीं देते और अपने काम में लगे रहते हैं। भारत सरकार ने इसके लिए कुछ जरुरी नियम भी बना रखें हैं।

ट्रैफिक नियम के अनुसार, तेज रफ्तार में गाड़ी चलाना, नशा कर गाड़ी चलाना, दो पहिया वाहनों पर दो से ज्यादा लोगों का बैठना, किसी भी प्रकार की गाड़ी चलाते समय मोबाईल का प्रयोग करना, 18 वर्ष के कम युवाओं का दो-पहिया या चार पाहिया वाहन का चलाना, चार पहिया वाहन चालक द्वारा सीट बेल्ट का प्रयोग ना करना, दो पहिया वाहन चालक का हेमलेट का प्रयोग ना करना, ट्रैफिक सिग्नल का पालन ना करना तथा लेन में उल्टी साईड गाड़ी चलाना और जेबरा क्रासिंग को नजरअंदाज करना कानूनन अपराध है। इसके लिए हमारे कानून में कड़ी सजा व जुर्माना का प्रावधान है।

उपरोक्त दिए गए ट्रैफिक नियमों को हम अच्छी तरह जानते भी हैं, मगर उसका पालन नहीं करते। अक्सर हम वाहन चालक को यह दलील देते हुए सुनते हैं कि, सर हम थोड़ी जल्दी में हैं। कुछ लोग तो अपने पद व अपनी पहुंच का प्रयोग कर ट्रैफिक पुलिस के सदस्यों को अपना धौंस खौफ दिखाते हैं। हम यह भी जानते हैं कि हमारी थोड़ी सी लापरवाही पैदल चल रहे यात्रियों, अन्य लोगों के साथ-साथ अपनी जींदगी भी दांव पर लगा लेते हैं।

हमारी इतनी जागरुकता के बाद भी हम अपनी गलतियों को दुहराते रहते हैं और कभी भी ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते। वाहन चालकों को लाख समझाने पर जब चालक नहीं मानते हैं तो ट्रैफिक पुलिस प्रशासन ने जागरुकता अभियान चलाया, स्कूलों, कॉलेजों के बच्चों के साथ समाज के वरिष्ठ नागरिकों का सहयोग लेना शुरु किया। आखिर ट्रैफिक प्रशासन को इस तरह के जागरुकता अभियान चलाने की क्या जरुरत पड़ी?

भारतीय ट्रैफिक प्रशासन कंट्रौल विभाग, नई दिल्ली की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल लगभग 1,35000 लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं और वर्ष 2013 में सड़क दुर्घटना का कुल आंकड़ा 5 लाख को पार कर गया। इस रिपोर्ट में सड़क दुर्घटना के अलग-अलग तरीकों से मरने वालों को मिलाकर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। जिसे लेकर सरकार और ट्रफिक पुलिस की काफी खिचाई होती है। इसलिए पुलिस प्रशासन को इस तरह की जागरुकता अभियान चलाने की जरुरत पड़ी।

हम कबतक दूसरों को दोष देते रहेंगे ? हम अपने आप मे सुधार क्यों नहीं करना चाहते?, क्या हम अब भी मानते हैं कि सड़क जाम और दुर्घटना के लिए ट्रैफिक पुलिस  और प्रशासन जिम्मेदार है? इस सवाल का जवाब आपके पास है। अब देखना यह है कि आप यातायात के नियमों का पालन करते  हैं या यातायात दुर्घटना की रिपोर्ट में अपना नाम दर्ज कराते हैं......