Saturday, 21 March 2015

बिहार की शिक्षा पद्धति पर उठते सवाल

-राकेश कुमार
बिहार में भी इन दिनों बोर्ड की परीक्षा चल रही है। इस परीक्षा में बैठने वाले छात्र का भविष्य इस बात पर टिका है कि वो इस परीक्षा को अच्छे अंक से पास करें तभी उन्हें किसी अच्छे कॉलेज या कोर्स में दाखिला मिल सकता है। लेकिन, इन दिनों बोर्ड परीक्षा में हो रही नकल ने न सिर्फ नकलची छात्रों बल्कि राज्य के प्रतिभाशाली छात्रों की योग्यता को भी संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। हालांकि इस बीच, नकल के मामले में 760 छात्रों को निष्कासित कर दिया है, जबकि 8 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया है।

बोर्ड परीक्षा में चल रही खुलेआम नकल से प्रदेश की शिक्षा प्रणाली पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है। अब तो लोग सवाल उठाने लगे हैं कि क्या बिहार में लोग ऐसे ही आईएस और आईपीएस बनते हैं? संभवत: 2004 के बाद इतने बड़े पैमाने पर खुलेआम धांधली की रिपोर्ट पहली बार आई है। 2004 में सात दिनों के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने परीक्षा के समय सभी परीक्षा केन्द्रों की वीडियोग्राफी कराने, शिक्षकों को छात्रों के साथ कड़ाई से पेश आने तथा भारी संख्या में पुलिस फोर्स तैनान करने का आदेश दिया था। इसके बाद से ही राज्य में धांधली ना के बराबर हो गई थी। इस बर्ष बोर्ड परीक्षा में हो रही धांधली ने राज्य सरकार की कलई खोल दी है।

इन सभी प्रश्नों से बिहारवासियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। ऊपर से बिहार के शिक्षा मंत्री का यह बेतुका बयान कि सरकार इसे नहीं रोक सकती, हम पुलिस को अपने भाई-बहनों पर तो लाठी नहीं चलवा सकते ना?

जिम्मेदार कौन? : बिहार बोर्ड परीक्षा में हो रही नकल के लिए जिम्मेदार केवल सरकार ही नहीं, बल्कि अभिभावक भी हैं। सभी का सपना होता है कि उनका बच्चा हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करे। यह सपना कोई बुरा नहीं है। इस परीक्षा में तो छात्रों के अभिभावक ही नकल करा रहे हैं। छात्र भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। हालांकि पैसे देने के आरोप तो पहले भी लगते रहे हैं।

शिक्षा प्रणाली  : बिहार में 2005 में सरकार बदली, राजनीति का स्तर बदला, लोगों की सोच बदली मगर जो नहीं बदल सकी वो है हमारी शिक्षा पद्धति। बिहार बोर्ड की परीक्षाएं अब सीबीएसई पैटर्न पर होने लगी है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2005 में नियुक्ति किए गए हाई स्कूल शिक्षकों में से 90 फीसदी शिक्षकों को अपने विषय का ज्ञान ही नहीं है। वहीं पहले से कार्यरत स्कूल शिक्षकों सहित हाई स्कूल के शिक्षकों में से 50 फीसदी शिक्षक सिफारिश पर जॉब कर रहे हैं। दूसरी ओर कुछ अच्छे शिक्षक हैं, वो पढ़ाना नहीं चाहते। ऐसे में वहां कोचिंग संस्थानों की भरमार लगी है, जिनका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना रह गया है।

बिहार के बारे 2005 से पूर्व कहा जाता था कि यहां कोई भी पैसे व नकल से पास हो सकता है। मगर जैसे ही 2005 में जदयू की पूर्ण सरकार सत्ता में आई, परीक्षा का स्तर बदल गया। 2012 तक तो सबकुछ ठीक चला। मगर जैसे ही बिहार की राजनीति में अस्थिरता आई, वहां की शिक्षा व्यवस्था भी बेकार होती चली गई। शिक्षक अच्छे वेतन की मांग को लेकर धरना करने लगे, परीक्षा केन्द्रों की वीडियोग्राफी करने वाले भी अब केवल नाम के लिए वीडियोग्राफी करने लगे, स्कूल प्रबंधन भी ढीला पड़ गया।  ऐसे में परीक्षा को कदाचार मुक्त बनाने का सरकार का सपना महज सपना बनकर रह गया। आज जो बोर्ड परीक्षा की स्थित है, उसका कारण भी यही है।
अब हम कैसे अपने राज्य सरकार, शिक्षक और अपने अभिभावक पर विश्वास दिलायें कि परीक्षा में दिए जा रहे उनके अकारण सहयोग से हमारे ऊपर उसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है? हम कैसे अपने माता-पिता के सपनों को पूरा कर पाएंगे, उसका जवाब हमारे पास भी नहीं है और ना हमारे अभिभावक के पास।

बिहार की शिक्षण प्रणाली पर लगने वाला यह दाग समय रहते नहीं धोया गया तो वो दिन दूर नहीं जब अच्छे संस्थानों में बिहारियों के प्रवेश पर रोक लग जाए और वहां की सरकार की थू-थू हो।


Thursday, 5 March 2015

बलात्कार पर भारतीयों की मानसिकता !!


आज पूरे भारत में जिस विषय पर बिना वजह विवाद हो रहा है, चर्चा हो रहा है, वो वास्तव में कोई विवाद नहीं है। लेकिन इस विषय वर बिना किसी प्रयास के किया गया शोध का परिणाम यह निकलता है कि आज भी भारत में 90 फीसदी से ज्यादा ऐसे लोग हैं जिनकी मानसकिता गंदी है, उनकी सोच गंदी है। ऐसे लोगों की दो तरह की मानसिकता होती है- एक तो जो ऊपर से दिख रही है, जिसे आप प्रभावित होते हैं, उन्हें अच्छे व्यक्तियों में गिनते हैं। वहीं दूसरी मानसिकता जो परदे के पीछे होती है, जो दिखाई नहीं देती मगर अपना काम कर जाती है। अगर नहीं तो आज पूरे भारत में इस तरह के बवाल नहीं मचता।

आज अगर निर्भया जिंदा होती तो शायद इस तरह की गंदी राजनीति का हिस्सा बनने से पहले ही इस दुनिया से दूर चली जाती। वहीं केवल 5 फीसदी ऐसे लोग हैं जो खुलकर बोल रहे हैं जबकि 5 फीसदी वैसे लोग हैं जिन्होने कुछ नहीं बोला या वो सूनकर अनजान रह गए।

दरअसल भारत मे पिछले दो दिनों से एक डाक्युमेंट्री पर विवाद चल रहा है जिसे विदेश की एक मीडिया चैनल द्वारा शोध कर तैयार किया गया है, जो भारत में बलात्कार के आरोपियों की मानसिकता पर आधारित है। लेकिन शायद उस मीडिया चैनल वाले भी नहीं जानते होगें की वो जिस विषय पर शोध करके गए हैं, उससे अलग विषय पर बिना किसी शोध का परिणाम सामने आ गया है- वो विषय है- बलात्कार मामले पर बहस/शोध के बाद लोगों की सोच।

वैसे देखा जाय तो भारत के लोगों की मानसिकता को लेकर छिड़ी यह विवाद कोई नई नहीं हैं। भारतीय राजनेता, समाजसेवी, बड़े अफसर तथा कोई बड़ा धार्मिक व्यक्ति अक्सर इस तरह का बयान देते रहते हैं जिसमें वो समाज की महिलाओं और लड़कियों को निशाना बनाते हैं और उन्हें उनके खिलाफ आपत्तिजनक बयान देते हैं।

आज की इस 21 सदी में एक तरह जहां लोग बेटियों को बचाने, समाज में उसका मुख्य स्थान दिलाने व शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें शहर में रहकर पढ़ाई, नौकरी नहीं करने, शाम 7 बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकलने, मॉडन कपड़े नहीं पहनने तथा किसी लड़के के साथ नहीं घूमने की सलाह देते हैं।

एक समाचार संगठन द्वारा बलात्कार के आरोपी के वकिल से बात की तो उन्होंने भी अपनी मानसिकता अच्छी ही दर्शायी। उनका कहना है कि अगर मेरी बेटी या बेटी इसत तरह किसी अनजान लड़के/लड़की की साथ रात में अकेले घूमते हुए पाए जाते तो मैं उसकी हत्या कर देता। मुझे लगता है शायद उन्हे ये काम अभी कर देना चाहिए क्योंकि वक्त का कोई भरोसा नहीं, किस तरफ हवा का रुख मोड़ दे और वो बाद में अपनी बातों से पलट जाएं।

लेकिन मैं ऐसे लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूं की क्या घर मैं कैद कर किसी लड़के या लड़की को अच्छा संस्कार सिखा सकते हैं, उन्हें अच्छी शिक्षा दिला सकते हैं? क्या वो अपने बच्चों को आत्म निर्भर बना रहे हैं? बड़े लोग तो शायद अपने बच्चों को विदेश भेज कर उस तरह के प्रश्ननों से बच भी जाएं लेकिन क्या वो जानते हैं कि उनके बच्चे विदेशों में क्या गुर खिला रहे है? तो शायद उनके पास इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं होगा, जो उनकी दोहरी मानसिकता को दर्शाती है।

एक प्रश्न और, वकिल साहब ने कहा कि अगर मेरे बच्चे रात के बारह बजे घर से बाहर मेरे से 
पूछकर बाहर जाएं तो मैं भी उनके साथ हो लूंगा। मगर क्या वो जानते हैं कि जिसके बच्चों के सर पर बाप या भाई का साया ना हो, तो फिर वो कहां जाएं किसी से सहारा मांगने? क्या उन्हें भरोसा है कि लड़कियों के बाहर जाते समय अगर परिवार का कोई सदस्य रात या दिन में कोई हो तो बलात्कार नहीं होंगे या इसतरह के मामले कम हो जायेगे? अगर वो इसतरह की सोच रखते हैं तो शायद मेरी उनको सलाह होगी की वो अपनी ज्ञान को थोड़ा और बढा़ए और समाचार चैनलों को देखने के बजाए समाचार-पत्रों को पढ़ा करें।

रही बात शोध की तो, शोध का तरीका सही रहा है और शोध का परिणाम भी सही रहा है। मगर एक चीज जो अलग रही है, इस शोध के बाद लोगों की सोंच, जो आज हमें स्पष्ट दिख रही है कि भारत के लोगों की क्या सोंच है? ..........



Tuesday, 3 March 2015

दहेज, समाज और सम्मान

राकेश कुमार  

भारतीय हिन्दू समाज में कई सदियों से दहेज प्रथा काफी प्रचलित है। इस प्रथा का प्रचलन इतना बढ़ा कि आज यह सभी समाज में फैल गया है। यह प्रथा खासकर देश के पूर्वी राज्यों (उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड के साथ उत्तराखंड) के कुछ जिलों में काफी प्रचलन में हैं। इस प्रथा में वर पक्ष वधू पक्ष से दहेज के रुप में पैसे लेना, अपना सम्मान समझते हैं। यानी जितना ज्यादा दहेज, उतना बड़ा सम्मान।

इस प्रथा के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य बिहार और उत्तरप्रदेश हैं। हालांकि बिहार का मैथली भाषी क्षेत्र और उत्तरप्रदेश का दिल्ली से सटे कुछ जिले इससे कम प्रभावित हैं। इन क्षेत्रों के लोगों का मानना हैं कि अगर आपने अपने बेटी/बहन/लड़की में दहेज के रुप में वर पक्ष को पैसे और उसके सुख-सुविधा के लिए समान नहीं दिए तो समाज में उसकी नाक कट जायेगी और उसे समाज में हीन भाव से देखा जायेगा।
दहेज शब्द का अर्थ है वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को अपने बेटी/लड़की/बहन की शादी के लिए पैसे और समान देना, जिससे वर पक्ष सहज स्वीकार कर अपने बेटे/भाई की शादी के लिए मंजूरी देता है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि लड़का जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा हो और किसी विभाग में सरकारी अफसर हो, उतना ही ज्यादा दहेज देना पड़ता है।

इन क्षेत्रों में होने वाली शादी में दहेज 4 लाख से 15 लाख रुपए तक पहुंच जाता है और फिर उसके साथ वर-वधु के आराम के लिए सभी तरह के बर्तन, महंगे कपड़े और ज्वेलरी, टीवी, फ्रिज, लैपटॉप तथा वाहन आदि समान साथ में देना होता है।  साथ ही शादी में होने वाले खर्च अलग से। यानी कुल मिलाकर एक मध्यम परिवार के लिए शादी में आज के समय में कम-से-कम 10 लाख रुपए पहुंच जाता है। इस तरह की ज्यादात्तर शादियां को मध्यम वर्ग का हरेक परिवार अर्फोड नहीं कर सकता है, इसलिए वो अपनी पुस्तैनी जमीन या तो बेच देता या या फिर उसे गिरवी रख देता है जिसके बदले में उसे कुछ पैसे मिल जाता है। कुछ लोग तो कर्ज लेकर इस तरह की शादियां करते हैं जिसे वो कभी अपनी जीदंगी में चुका नहीं पाते।

लोगों का मानना है कि अगर कोई इसका विरोध करता है तो फिर समाज में उसे हीन भाव से देखा जाता है, समाज उसके परिवार से दूरी बना लेता है। फिर उस घर में किसी भी प्रकार का शुभ-मांगलिक कार्यो का समाज बहिस्कार करता है। इसलिए कोई भी दहेज देने से मना नहीं करता। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अगर किसी प्रकार जोर-जबरदस्ती कर शादी कर दी जाती है तो फिर ससुराल पक्ष लड़की को काफी तंग करते हैं, उसे काफी मार-पीट करते हैं, यानी कुल मिलाकर कहें तो काफी प्रताड़ित करते हैं। कौन अपने ही घर की बर्बादी देखेगा, इसलिए कोई भी इस प्रथा का विरोध नहीं करता हैं।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह प्रथा कब तक जारी रहेगा, कबतक तो समाज के सम्मान की डर से इस तरह के कुप्रथाओं से बचकर निकलते रहेंगे, क्या हमारी शिक्षण प्रणाली और कानून इतने कमजोर हैं कि यह प्रथा सदियों से चली आ रही है, कबतक हम इस आग में जलेंगे और दूसरों को भी जलाएंगे?  क्या हमारा समाज हमें समाज से विद्रोह करने से रोक रहा है?

इसका जवाब होगा- हॉ। इसे रोकन के लिए हमें समाज को जागरुक करना होगा, खुद कदम बढ़ाना होगा, अगर समाज सामने खड़ा हो तो कानून का सहारा लेना होगा, अपने क्षेत्र में जागरुकता अभियान चलाकर लोगों को इस कुप्रथा के प्रभावों और इसके नाकरात्मक पहलुओं को बताना होगा, तभी हम इससे निजात पा सकते है। इसके लिए हमे मीडिया का सहारा अवश्य लेना होगा, वरना हमारी पुरी जागरुकता अभियान अधुरी रह जायेगी।

अब हमें युवाओं को आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा लव-मैरेज और कोर्ट मैरेज को बढ़ावा देकर दहेज जैसे कुप्रथाओं को दूर करना चाहिए।




Keywords:  समाज, दहेज, सम्मान, बिहार, शादियां


Monday, 2 March 2015

जदयू और नीतीश का आस्तित्व खतरे में !

राकेश कुमार
(राजनीति विश्लेषण )

किसी ने सच ही कहा है कि इंसान को इन दो चीजों का कभी भी लोभ नहीं करना चाहिए, एक है पैसा और दूसरा सत्ता। ये दोनों ही एक अच्छे भले इंसान को भाई तक से लड़ाई करा देता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है - बिहार के मुख्यमंत्री, जदयू के वरिष्ठ नेता और विकास पुरुष के नाम से पहचाने जाने वाले नीतीश कुमार।

हाल के दिनों में बिहार की राजनीति की दशा बदली है, उसके कारण है नीतीश कुमार की महत्वकांक्षा, सत्ता का लोभ और अपने आप में ज्यादा विश्वास। बिहार के एक छोटे से गांव में किसान के घर जन्में नीतीश कुमार गरीबी को अच्छी तरह जानते है। उन्होंने पटना कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही राजनीति में आ गए थे। वे जयप्रकाश नारायण की राह पर चलते हुए 2006 तक राजनीति में अपने ऊपर कोई आंच नहीं आने दिया और हर जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाया।

वर्ष 2004 में जब नीतीश कुमार 7 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होने अपनी ईमानदारी का छाप लोगों पर छोड़ दिया था। यही कारण है कि 2005 और 2010 में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो लोगों ने उनपर ज्यादा भरोसा दिखाया। 2010 में जब कुमार चुनाव जीते तो उन्हे अपने आप में और अपने फैसलों पर ज्यादा विश्वास होने लगा। उन्हे लगा कि इस बार चुनाव वो अपने दम पर जीते हैं ना कि पार्टी के दम पर। बस यहीं से उनकी राजनीतिक छवी खराब होने लगी। वो लगातार गलत फैसले लेते गए और 2014 में तो उन्होने अपनी जींदगी का सबसे बड़ा गलत फैसले लेते हुए भाजपा से अलग हो गए। इसे जदयू पार्टी का दूर्भाग्य कहें या नीतीश कुमार की, 2014 में हुए विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा।

इस बार के बाद बिहार की जनता का कहना था कि नीतीश कुमार के घंमड़ को तोड़ना बहुत जरुरी हो गया था। इसके बाद भी नीतीश कुमार हार से सबक नहीं ले सके और लोकसभा चुनाव में केवल तीन सीट ही जीत पाए। नीतीश कुमार के लिए यही वो समय था जब वो कुछ बड़े फैसले लेकर एक नई रणनीति तैयार कर 2015 के विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियां करते, मगर हुआ इसके उलट। उन्होने तो हार की जिम्मेदारी लेकर मुख्यमंत्री का पद तो छोड़ दिया मगर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया जो मौके की ताक में था।

नीतीश कुमार गलतियां करनें में यहीं तक नहीं रुके, वो अपने सबसे बड़े विरोधी लालू प्रसाद और कांग्रेस से नाता जोड़ लिया और तीसरे मोर्चे की तैयारी करने लगे। इसका फायदा उठाकर मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अपने लिए मैदान तैयार करना शुरू कर दिया और नीतीश कुमार को इसकी भनक तक नहीं लगी। और जब भनक लगी तबतक बहुत देर हो चुकी थी। जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार की राजनीति के लिए गड्ढा खोद चुके थे। नीतीश को लगा कि वो मांझी को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन जाएं, मगर मांझी ने इस्तीफा देने से इंकार कर कुमार के महत्वकांक्षा पर पानी फेर दिया। इसके बाद जदयू  में दो फाड़ हो गया, एक फाड़ नीतीश कुमार का और दूसरा मांझी।

अब बिहार की राजनीति यह है कि नीतीश कुमार चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री बन गए हैं मगर हकिकत यह है कि वो मांझी के बनाएं गड्ढे में गिरते जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लसकों के अनुसार इसमें कोई शक नहीं कि इस पूरे खेल के पीछे भाजपा का हाथ है। भाजपा ने मांझी का साथ देकर बिहार में महादलित वोट, अल्पसंख्यक वोट अपने पाले में कर लिया है जो अबतक जदयू का था। राजद भी भले ही जदयू के साथ है मगर उसका वोट जस-का-तस बना रहेगा। जबकि नीतीश कुमार का पूरी तरह से कट जाने की संभावना दिख रही है।

इस साल होने वाले चुनाव में अगर कोई चमत्कार ना हुआ तो जदयू का नीतीश कुमार की राजनीती का वहीं हस्त्र होगा जैसा दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस का हुआ। अब देखते हैं कि क्या नीतीश कुमार बिहार के जनता में पहले जैसा विश्वास जगा पाते हैं या जनता उन्हें सबक सिखाती है।

कभी तो हौसला कर

स्वाती तिवारी

कभी तो हौसला कर अपने परों पर, 
अकेला तो निकल अपने घर से
ये गुलशन, ये बागवां तेरा, 
ये जमीं ये आसमां तेरा
उतारनी तो होगी बर्गद की छांव अपने सर से
कभी अकेले तो निकल अपने घर से..........

ये सपने, ये जिन्दगी तेरी,
कभी रौशनी के साये, 
तो कभी रात अन्धेरी है।
मंजिल का मिलना तभी मुम्किन है, 
जब ना बहकेगा अपनी डगर से
 कभी तो हौसला कर अपने पर पे, 
अकेला तो निकल अपने घर से

मुझे तो लोगो ने बहुत समझाया, 
उल्टी-पुल्टी बातें कि, बहुत डराया।
कहा जिन्दगी इसी घौसले के अन्दर है, 
यही जमीन यही समन्दर है। 
कुछ नही मिला अकेले सफर से.......
फिर भी निकला हूं मैं घर से, 
कुछ तो भरोसा आया है अपने पर पे......

बस थोडा सा थका हूं पर, हारा नही हूं...
हां स्थिति अनुलकूल नहीं है पर, मै ठहरा नहीं हूं...
सांसे रुकी है पर धड्कन चल रही है।
ना जाने आज ये कैसा सवेरा हुआ, 

आंखे लगी भी नही, और खुली भी नही।
दिल अभी उड़ना सीखा भी नही था कि पैर डगमगा गए


जाने कहां ले जाएंगे ये घने बादल आज, 
लगता है बडी़ दूर से आये हैं किसी की तलाश में.........