Monday, 2 March 2015

कभी तो हौसला कर

स्वाती तिवारी

कभी तो हौसला कर अपने परों पर, 
अकेला तो निकल अपने घर से
ये गुलशन, ये बागवां तेरा, 
ये जमीं ये आसमां तेरा
उतारनी तो होगी बर्गद की छांव अपने सर से
कभी अकेले तो निकल अपने घर से..........

ये सपने, ये जिन्दगी तेरी,
कभी रौशनी के साये, 
तो कभी रात अन्धेरी है।
मंजिल का मिलना तभी मुम्किन है, 
जब ना बहकेगा अपनी डगर से
 कभी तो हौसला कर अपने पर पे, 
अकेला तो निकल अपने घर से

मुझे तो लोगो ने बहुत समझाया, 
उल्टी-पुल्टी बातें कि, बहुत डराया।
कहा जिन्दगी इसी घौसले के अन्दर है, 
यही जमीन यही समन्दर है। 
कुछ नही मिला अकेले सफर से.......
फिर भी निकला हूं मैं घर से, 
कुछ तो भरोसा आया है अपने पर पे......

बस थोडा सा थका हूं पर, हारा नही हूं...
हां स्थिति अनुलकूल नहीं है पर, मै ठहरा नहीं हूं...
सांसे रुकी है पर धड्कन चल रही है।
ना जाने आज ये कैसा सवेरा हुआ, 

आंखे लगी भी नही, और खुली भी नही।
दिल अभी उड़ना सीखा भी नही था कि पैर डगमगा गए


जाने कहां ले जाएंगे ये घने बादल आज, 
लगता है बडी़ दूर से आये हैं किसी की तलाश में.........