Monday, 2 March 2015

जदयू और नीतीश का आस्तित्व खतरे में !

राकेश कुमार
(राजनीति विश्लेषण )

किसी ने सच ही कहा है कि इंसान को इन दो चीजों का कभी भी लोभ नहीं करना चाहिए, एक है पैसा और दूसरा सत्ता। ये दोनों ही एक अच्छे भले इंसान को भाई तक से लड़ाई करा देता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है - बिहार के मुख्यमंत्री, जदयू के वरिष्ठ नेता और विकास पुरुष के नाम से पहचाने जाने वाले नीतीश कुमार।

हाल के दिनों में बिहार की राजनीति की दशा बदली है, उसके कारण है नीतीश कुमार की महत्वकांक्षा, सत्ता का लोभ और अपने आप में ज्यादा विश्वास। बिहार के एक छोटे से गांव में किसान के घर जन्में नीतीश कुमार गरीबी को अच्छी तरह जानते है। उन्होंने पटना कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही राजनीति में आ गए थे। वे जयप्रकाश नारायण की राह पर चलते हुए 2006 तक राजनीति में अपने ऊपर कोई आंच नहीं आने दिया और हर जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाया।

वर्ष 2004 में जब नीतीश कुमार 7 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होने अपनी ईमानदारी का छाप लोगों पर छोड़ दिया था। यही कारण है कि 2005 और 2010 में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो लोगों ने उनपर ज्यादा भरोसा दिखाया। 2010 में जब कुमार चुनाव जीते तो उन्हे अपने आप में और अपने फैसलों पर ज्यादा विश्वास होने लगा। उन्हे लगा कि इस बार चुनाव वो अपने दम पर जीते हैं ना कि पार्टी के दम पर। बस यहीं से उनकी राजनीतिक छवी खराब होने लगी। वो लगातार गलत फैसले लेते गए और 2014 में तो उन्होने अपनी जींदगी का सबसे बड़ा गलत फैसले लेते हुए भाजपा से अलग हो गए। इसे जदयू पार्टी का दूर्भाग्य कहें या नीतीश कुमार की, 2014 में हुए विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा।

इस बार के बाद बिहार की जनता का कहना था कि नीतीश कुमार के घंमड़ को तोड़ना बहुत जरुरी हो गया था। इसके बाद भी नीतीश कुमार हार से सबक नहीं ले सके और लोकसभा चुनाव में केवल तीन सीट ही जीत पाए। नीतीश कुमार के लिए यही वो समय था जब वो कुछ बड़े फैसले लेकर एक नई रणनीति तैयार कर 2015 के विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियां करते, मगर हुआ इसके उलट। उन्होने तो हार की जिम्मेदारी लेकर मुख्यमंत्री का पद तो छोड़ दिया मगर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया जो मौके की ताक में था।

नीतीश कुमार गलतियां करनें में यहीं तक नहीं रुके, वो अपने सबसे बड़े विरोधी लालू प्रसाद और कांग्रेस से नाता जोड़ लिया और तीसरे मोर्चे की तैयारी करने लगे। इसका फायदा उठाकर मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अपने लिए मैदान तैयार करना शुरू कर दिया और नीतीश कुमार को इसकी भनक तक नहीं लगी। और जब भनक लगी तबतक बहुत देर हो चुकी थी। जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार की राजनीति के लिए गड्ढा खोद चुके थे। नीतीश को लगा कि वो मांझी को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन जाएं, मगर मांझी ने इस्तीफा देने से इंकार कर कुमार के महत्वकांक्षा पर पानी फेर दिया। इसके बाद जदयू  में दो फाड़ हो गया, एक फाड़ नीतीश कुमार का और दूसरा मांझी।

अब बिहार की राजनीति यह है कि नीतीश कुमार चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री बन गए हैं मगर हकिकत यह है कि वो मांझी के बनाएं गड्ढे में गिरते जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लसकों के अनुसार इसमें कोई शक नहीं कि इस पूरे खेल के पीछे भाजपा का हाथ है। भाजपा ने मांझी का साथ देकर बिहार में महादलित वोट, अल्पसंख्यक वोट अपने पाले में कर लिया है जो अबतक जदयू का था। राजद भी भले ही जदयू के साथ है मगर उसका वोट जस-का-तस बना रहेगा। जबकि नीतीश कुमार का पूरी तरह से कट जाने की संभावना दिख रही है।

इस साल होने वाले चुनाव में अगर कोई चमत्कार ना हुआ तो जदयू का नीतीश कुमार की राजनीती का वहीं हस्त्र होगा जैसा दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस का हुआ। अब देखते हैं कि क्या नीतीश कुमार बिहार के जनता में पहले जैसा विश्वास जगा पाते हैं या जनता उन्हें सबक सिखाती है।