Tuesday, 3 March 2015

दहेज, समाज और सम्मान

राकेश कुमार  

भारतीय हिन्दू समाज में कई सदियों से दहेज प्रथा काफी प्रचलित है। इस प्रथा का प्रचलन इतना बढ़ा कि आज यह सभी समाज में फैल गया है। यह प्रथा खासकर देश के पूर्वी राज्यों (उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड के साथ उत्तराखंड) के कुछ जिलों में काफी प्रचलन में हैं। इस प्रथा में वर पक्ष वधू पक्ष से दहेज के रुप में पैसे लेना, अपना सम्मान समझते हैं। यानी जितना ज्यादा दहेज, उतना बड़ा सम्मान।

इस प्रथा के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य बिहार और उत्तरप्रदेश हैं। हालांकि बिहार का मैथली भाषी क्षेत्र और उत्तरप्रदेश का दिल्ली से सटे कुछ जिले इससे कम प्रभावित हैं। इन क्षेत्रों के लोगों का मानना हैं कि अगर आपने अपने बेटी/बहन/लड़की में दहेज के रुप में वर पक्ष को पैसे और उसके सुख-सुविधा के लिए समान नहीं दिए तो समाज में उसकी नाक कट जायेगी और उसे समाज में हीन भाव से देखा जायेगा।
दहेज शब्द का अर्थ है वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को अपने बेटी/लड़की/बहन की शादी के लिए पैसे और समान देना, जिससे वर पक्ष सहज स्वीकार कर अपने बेटे/भाई की शादी के लिए मंजूरी देता है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि लड़का जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा हो और किसी विभाग में सरकारी अफसर हो, उतना ही ज्यादा दहेज देना पड़ता है।

इन क्षेत्रों में होने वाली शादी में दहेज 4 लाख से 15 लाख रुपए तक पहुंच जाता है और फिर उसके साथ वर-वधु के आराम के लिए सभी तरह के बर्तन, महंगे कपड़े और ज्वेलरी, टीवी, फ्रिज, लैपटॉप तथा वाहन आदि समान साथ में देना होता है।  साथ ही शादी में होने वाले खर्च अलग से। यानी कुल मिलाकर एक मध्यम परिवार के लिए शादी में आज के समय में कम-से-कम 10 लाख रुपए पहुंच जाता है। इस तरह की ज्यादात्तर शादियां को मध्यम वर्ग का हरेक परिवार अर्फोड नहीं कर सकता है, इसलिए वो अपनी पुस्तैनी जमीन या तो बेच देता या या फिर उसे गिरवी रख देता है जिसके बदले में उसे कुछ पैसे मिल जाता है। कुछ लोग तो कर्ज लेकर इस तरह की शादियां करते हैं जिसे वो कभी अपनी जीदंगी में चुका नहीं पाते।

लोगों का मानना है कि अगर कोई इसका विरोध करता है तो फिर समाज में उसे हीन भाव से देखा जाता है, समाज उसके परिवार से दूरी बना लेता है। फिर उस घर में किसी भी प्रकार का शुभ-मांगलिक कार्यो का समाज बहिस्कार करता है। इसलिए कोई भी दहेज देने से मना नहीं करता। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अगर किसी प्रकार जोर-जबरदस्ती कर शादी कर दी जाती है तो फिर ससुराल पक्ष लड़की को काफी तंग करते हैं, उसे काफी मार-पीट करते हैं, यानी कुल मिलाकर कहें तो काफी प्रताड़ित करते हैं। कौन अपने ही घर की बर्बादी देखेगा, इसलिए कोई भी इस प्रथा का विरोध नहीं करता हैं।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह प्रथा कब तक जारी रहेगा, कबतक तो समाज के सम्मान की डर से इस तरह के कुप्रथाओं से बचकर निकलते रहेंगे, क्या हमारी शिक्षण प्रणाली और कानून इतने कमजोर हैं कि यह प्रथा सदियों से चली आ रही है, कबतक हम इस आग में जलेंगे और दूसरों को भी जलाएंगे?  क्या हमारा समाज हमें समाज से विद्रोह करने से रोक रहा है?

इसका जवाब होगा- हॉ। इसे रोकन के लिए हमें समाज को जागरुक करना होगा, खुद कदम बढ़ाना होगा, अगर समाज सामने खड़ा हो तो कानून का सहारा लेना होगा, अपने क्षेत्र में जागरुकता अभियान चलाकर लोगों को इस कुप्रथा के प्रभावों और इसके नाकरात्मक पहलुओं को बताना होगा, तभी हम इससे निजात पा सकते है। इसके लिए हमे मीडिया का सहारा अवश्य लेना होगा, वरना हमारी पुरी जागरुकता अभियान अधुरी रह जायेगी।

अब हमें युवाओं को आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा लव-मैरेज और कोर्ट मैरेज को बढ़ावा देकर दहेज जैसे कुप्रथाओं को दूर करना चाहिए।




Keywords:  समाज, दहेज, सम्मान, बिहार, शादियां