Thursday, 5 March 2015

बलात्कार पर भारतीयों की मानसिकता !!


आज पूरे भारत में जिस विषय पर बिना वजह विवाद हो रहा है, चर्चा हो रहा है, वो वास्तव में कोई विवाद नहीं है। लेकिन इस विषय वर बिना किसी प्रयास के किया गया शोध का परिणाम यह निकलता है कि आज भी भारत में 90 फीसदी से ज्यादा ऐसे लोग हैं जिनकी मानसकिता गंदी है, उनकी सोच गंदी है। ऐसे लोगों की दो तरह की मानसिकता होती है- एक तो जो ऊपर से दिख रही है, जिसे आप प्रभावित होते हैं, उन्हें अच्छे व्यक्तियों में गिनते हैं। वहीं दूसरी मानसिकता जो परदे के पीछे होती है, जो दिखाई नहीं देती मगर अपना काम कर जाती है। अगर नहीं तो आज पूरे भारत में इस तरह के बवाल नहीं मचता।

आज अगर निर्भया जिंदा होती तो शायद इस तरह की गंदी राजनीति का हिस्सा बनने से पहले ही इस दुनिया से दूर चली जाती। वहीं केवल 5 फीसदी ऐसे लोग हैं जो खुलकर बोल रहे हैं जबकि 5 फीसदी वैसे लोग हैं जिन्होने कुछ नहीं बोला या वो सूनकर अनजान रह गए।

दरअसल भारत मे पिछले दो दिनों से एक डाक्युमेंट्री पर विवाद चल रहा है जिसे विदेश की एक मीडिया चैनल द्वारा शोध कर तैयार किया गया है, जो भारत में बलात्कार के आरोपियों की मानसिकता पर आधारित है। लेकिन शायद उस मीडिया चैनल वाले भी नहीं जानते होगें की वो जिस विषय पर शोध करके गए हैं, उससे अलग विषय पर बिना किसी शोध का परिणाम सामने आ गया है- वो विषय है- बलात्कार मामले पर बहस/शोध के बाद लोगों की सोच।

वैसे देखा जाय तो भारत के लोगों की मानसिकता को लेकर छिड़ी यह विवाद कोई नई नहीं हैं। भारतीय राजनेता, समाजसेवी, बड़े अफसर तथा कोई बड़ा धार्मिक व्यक्ति अक्सर इस तरह का बयान देते रहते हैं जिसमें वो समाज की महिलाओं और लड़कियों को निशाना बनाते हैं और उन्हें उनके खिलाफ आपत्तिजनक बयान देते हैं।

आज की इस 21 सदी में एक तरह जहां लोग बेटियों को बचाने, समाज में उसका मुख्य स्थान दिलाने व शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें शहर में रहकर पढ़ाई, नौकरी नहीं करने, शाम 7 बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकलने, मॉडन कपड़े नहीं पहनने तथा किसी लड़के के साथ नहीं घूमने की सलाह देते हैं।

एक समाचार संगठन द्वारा बलात्कार के आरोपी के वकिल से बात की तो उन्होंने भी अपनी मानसिकता अच्छी ही दर्शायी। उनका कहना है कि अगर मेरी बेटी या बेटी इसत तरह किसी अनजान लड़के/लड़की की साथ रात में अकेले घूमते हुए पाए जाते तो मैं उसकी हत्या कर देता। मुझे लगता है शायद उन्हे ये काम अभी कर देना चाहिए क्योंकि वक्त का कोई भरोसा नहीं, किस तरफ हवा का रुख मोड़ दे और वो बाद में अपनी बातों से पलट जाएं।

लेकिन मैं ऐसे लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूं की क्या घर मैं कैद कर किसी लड़के या लड़की को अच्छा संस्कार सिखा सकते हैं, उन्हें अच्छी शिक्षा दिला सकते हैं? क्या वो अपने बच्चों को आत्म निर्भर बना रहे हैं? बड़े लोग तो शायद अपने बच्चों को विदेश भेज कर उस तरह के प्रश्ननों से बच भी जाएं लेकिन क्या वो जानते हैं कि उनके बच्चे विदेशों में क्या गुर खिला रहे है? तो शायद उनके पास इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं होगा, जो उनकी दोहरी मानसिकता को दर्शाती है।

एक प्रश्न और, वकिल साहब ने कहा कि अगर मेरे बच्चे रात के बारह बजे घर से बाहर मेरे से 
पूछकर बाहर जाएं तो मैं भी उनके साथ हो लूंगा। मगर क्या वो जानते हैं कि जिसके बच्चों के सर पर बाप या भाई का साया ना हो, तो फिर वो कहां जाएं किसी से सहारा मांगने? क्या उन्हें भरोसा है कि लड़कियों के बाहर जाते समय अगर परिवार का कोई सदस्य रात या दिन में कोई हो तो बलात्कार नहीं होंगे या इसतरह के मामले कम हो जायेगे? अगर वो इसतरह की सोच रखते हैं तो शायद मेरी उनको सलाह होगी की वो अपनी ज्ञान को थोड़ा और बढा़ए और समाचार चैनलों को देखने के बजाए समाचार-पत्रों को पढ़ा करें।

रही बात शोध की तो, शोध का तरीका सही रहा है और शोध का परिणाम भी सही रहा है। मगर एक चीज जो अलग रही है, इस शोध के बाद लोगों की सोंच, जो आज हमें स्पष्ट दिख रही है कि भारत के लोगों की क्या सोंच है? ..........