Friday, 28 August 2015

आरक्षण की आग में झुलसता आम भारतीय

राकेश कुमार

 आज पूरा भारत आरक्षण की आग में झुलस रहा है। देश के सभी क्षेत्रों में समय-समय पर अपने जाती को विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण देने की मांग को लेकर लगातार आंदोलन करते रहते हैं जिससे भारत की अर्थव्यवस्था अस्थिर हो जाती है। गुजरात हो या महाराष्ट्र, राजस्थान हो या पंजाब, आज इनहीं क्षेत्रों में आरक्षण की मांग ज्यादा हो रही है और अपनी मांगे मनवाने के लिए लगातार आंदोलन कर राज्य सरकार पर दबाव बनाया जाता है।

 लेकिन क्या आपको मालूम है कि इस जाती आधारित आंदोलन की आग में सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता को होता है। ऐसी आम जनता है जो एक वक्त के भोजन के लिए दिन-भर भागादौड़ कर कुछ जरुरी समाग्री व पैसे एकत्र करते हैं। उन्हे यह भी नहीं मालूम की देश में क्या हो रहा है।

भारत में आरक्षण की शुरुआत 18वीं सदी के मध्य में हुआ। पूरे दक्षिण भारत में हो रहे जातीय समीकरणों और निचले तबके को समाज के विशेष स्थान दिलाने के लिए चल रहे आंदोलन के बाद तत्कालिन ब्रिटिश शासक ने कई आयोग बनाए जिनहोंने भी शिक्षा, नौकरी तथा अन्य क्षेत्रों में आरक्षण की मांग को सही ठहराया।

 महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण का प्रारम्भ किया था। कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों/समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए 1902 की अधिसूचना जारी की गयी थी। यह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है।

 19वीं सदी के मध्य में भारत में तो जैसे देश में आरक्षण की मांग की बाढ़ आ गई। देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले अनुसुचित जाती और जनजातीयों ने अपने लिए शिक्षा और नौकरी के सभी क्षेत्रों में आरक्षण की मांग शुरु हो गई जिसको लेकर देश में सभी जातीयों ने व्यापक स्तर पर आंदोलन चलाएं गए। इन आंदोलनों में कभी-कभी आंदोलन कारियों और सरकार में झड़प भी हुई तथा सरकारी संपत्ती को काफी नुकसान पहुंचा। इन सभी आंदोलनों के कारण देश की वैसी जनता पर खासा असर पड़ता है जो एक वक्त की रोटी की व्यस्था के लिए दिनभर नौकरी की तलास में रहते हैं।

 भारतीय गरीबों के पास ना तो रहने के लिए पक्का छत है, ना ही अपने बच्चो को स्कूलों में पढ़ाने के लिए पैसे और ना ही भरपेट भोजन की व्यवस्था। भारत के सर्वेक्षण रिपोर्ट 2014 के अनुसार भारत में कुल आबादी की लगभग 30 फीसदी आबादी गरीबों की है जिनकी दैनिक आय 22 रुपए से भी कम है और वो दूसरों पर आश्रीत हैं। ऐसे लोगों को जाती और धर्म से उतना लगाव नहीं होता है। अगर असल देखा जाए तो आरक्षण की मांग इन्ही गरीबों को करना चाहिए और आरक्षण भी इन्हें ही मिलना चाहिए।

 फिर प्रश्न यह उठता है कि क्या रोजाना पार्टी करने वाले, पक्के मकानों में रहने वाले, दो-चार पहियों पर घुमने वाले, निजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले, होटलों में खाना खाने वाले तथा रोजाना मौज-मस्ती करने वाले लोगों व जातियों को आरक्षण क्यों दिया जाय और वो इसकी मांग क्यों करते हैं। ऐसे लोग गरीबो के मसीहा बनकर उनका हक मारना जानते हैं।

 आज जिस तरह से आरक्षण की मांग के लिए जाट, गुर्जर, पटेल, मुस्लमान अन्य पिछड़ा वर्ग आंदोलन कर रहा हैं उसके कारण राज्य व शहर की अर्थव्यवस्था खराब हो जाती है। रोजमर्रा के वस्तुओं के कमी के कारण उसके दामे बढ़ जाती है, यातायात सेवाएं ठप हो जाती है तथा छोटे-छोटे संस्थान बंद हो जाते हैं जिसके कारण इन संस्थानों पर आश्रित लागों का रोजगार छिन जाता है और वो अपने घरो में बैठने को मजबुर हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसे लोग इन आदोलनों की भेंट भी चढ़ जाते हैं जिनके कारण कई घरों के चुल्हे सदा के लिए बंद हो जाते हैं और वो दर-दर भीख मांगने को मजबुर हो जाते हैं।

 फिर प्रश्न यह उठता है कि क्या सरकार को आरक्षण की मांग कर रहे समुदायों को ऐसे आंदोलन करने की अनुमती देना चाहिए? क्या आज के पढ़े-लिखे लोगों को सरकार से अपने हक की लड़ाई में दूसरों का हक मारने का अधिकार है? क्या आरक्षण की मांग करने वाले लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं? इन सभी सवालों का केवल एक ही जवाब है नहीं।


 भारत में सभी लोगों को यह हक है कि वो अपने हक की मांग करे और उसके लिए अवाज उठाए, मगर शांति ढंग से, हिंसा से नहीं। दूसरो के जीने का अधिकार छिनकर नहीं। अपनी अधिकारों की लड़ाई में दूसरों का अधिकार छिनने का अधिकार भारत में किसी को नहीं है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे भारतीय दंड सहिंता की विभिन्न धाराओं के तहत दंड दिया जा सकता है। इसलिए यह विषय सोचने योग्य है।